
बिहार का मखाना आज ग्लोबल हो गया है. पूरी दुनिया में उसका डंका बज रहा है. लेकिन उसी बिहार का मक्का आज अपनी पहचान के लिए तरस रहा है. एक ही राज्य के दो कृषि प्रोडक्ट के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों? जबकि फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय बिहार के चर्चित नेता चिराग पासवान के पास है. किसानों का चिराग पासवान से सवाल है कि मखाना तो ग्लोबल बन गया, लेकिन मक्के को लोकल बनाकर क्यों छोड़ दिया. सरकार के पास इसका कोई जवाब है? शायद नहीं.
बिहार में आज लाखों किसान मक्के की खेती में लगे हैं. सरकार ने इन किसानों को मक्के की खेती में लगने के लिए प्रोत्साहित किया. सरकार ने कहा कि तुम मक्के की खेती करो, हम उसे खरीदेंगे और सही दाम देंगे. किसानों ने सरकार की बात मानी और उत्पादन बढ़ाया. लेकिन अब किसानों के साथ धोखा हो रहा है. किसानों के मक्के की बदौलत बिहार में 14 इथेनॉल फैक्ट्रियां लगीं, इथेनॉल भी बनने लगा. लेकिन नियमों में ऐसी पलटी मारी कि मक्का मुंह के बल गिर गया. मक्का का रेट 1700 रुपये पर आ गया. जबकि एमएसपी 2400 रुपये है. अब इथेनॉल फैक्ट्रियां बंद होने की कगार पर हैं.
किसान मक्के की इस नाकामी के पीछे सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं. किसानों की शिकायत इसलिए भी गंभीर हो जाती है क्योंकि केंद्रीय फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय बिहार के ही चर्चित नेता चिराग पासवान के पास है. किसानों की शिकायत है कि पासवान अक्सर बिहार और बिहारी अस्मिता की बात करते हैं, लेकिन आज बिहार के किसानों के सामने रोजगार के लाले पड़ रहे हैं. किसानों ने मक्के में रोजगार ढूंढा भी, लेकिन उसमें नाकामी हाथ लगी. पेट्रोलियम और उद्योग मंत्रालय के सहयोग से इथेनॉल फैक्ट्रियां खुलीं भी, लेकिन अब उनका अस्तित्व खतरे में है. किसान पूछ रहे हैं कि चिराग पासवान का फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय क्या कर रहा है?
अब जरा मखाना और मक्का की तुलना कर लेते हैं. बिहार में मखाना की कई प्रोसेसिंग यूनिट लगीं. खासकर मधुबनी, दरभंगा और कटिहार जिलों में. मखाना की प्रोसेसिंग में आधुनिक मशीनों से लेकर कुटीर उद्योग तक में काम होता है. यहां तक कि सरकारी योजना भी चलती है. इसमें मखाना विकास योजना शामिल है. मखाना को लेकर वैल्यू एडेडे प्रोडक्ट और एक्सपोर्ट पर भी सरकार का जोर है. नतीजा साफ है-आज मखाना पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है.
लेकिन बिहार के मक्के की ऐसी दुर्गति क्यों? इसके जवाब में एक्सपर्ट बताते हैं कि मक्के के लिए इस तरह की प्रोसेसिंग यूनिट की घोर कमी है. स्टार्च, ग्रिट्स और बायोफ्यूल के क्षेत्र में अधूरा काम हुआ है. इथेनॉल प्लांट भी बंदी की कगार पर हैं. बिहार से ही फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय होने के बावजूद मक्के के लिए मखाना की तरह कोई डेडिकेटेड सरकारी योजना नहीं है. साथ ही, मक्के की प्रोसेसिंग के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की भी किल्लत है.
उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि मक्के की प्रोसेसिंग के लिए बिजली सप्लाई बड़ी चुनौती है. कुछ बड़ी यूनिटें हैं जो कैप्टिव पावर सप्लाई से चलती हैं. प्रोसेसिंग के क्षेत्र में किसानों के लिए ट्रेनिंग और आंत्रप्रेन्योर की भी भारी कमी है. ऐसे में बिहार का मक्का ग्लोबल कैसे बनेगा, बड़ा सवाल है.
बेगूसराय के मक्का किसान और व्यापारी संतोष शर्मा इस दुर्गति के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं. उन्होंने कहा, सरकार जब तक किसानों से 100 परसेंट इथेनॉल की खरीद नहीं करेगी, किसानों की हालत सुधरने वाली नहीं है. इथेनॉल की अभी 50 परसेंट पर खरीद चल रही है और उसमें भी 25 परसेंट चावल की मिलावट हो रही है. इससे किसानों के मक्के की मांग आधी रह गई है. ऐसे हालात में मक्का ग्लोबल कैसे बनेगा. वे कहते हैं कि किसानों के बच्चे इथेनॉल फैक्ट्रियों में लगे थे, रोजगार मिला था. लेकिन अब रोजगार जाने की नौबत है. किसानों के मक्के का भाव रसातल में है.
मुजफ्फरपुर के मक्का किसान सतीश द्विवेद्वी भी इसके लिए फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं कि चिराग पासवान ने बिहार के लिए कुछ नहीं किया जबकि करने को बहुत कुछ था. मक्के से मुर्गी दाना और मक्का तेल बन सकता था. इसमें कई संभावनाएं हैं, लेकिन सरकार ने अभी तक कोई बड़ा प्लांट नहीं लगाया. नतीजा है कि बिहार का मक्का हैदराबाद जा रहा है, वहां पोल्ट्री फीड बन रही है और किसानों को बेचा जा रहा है. इसमें बिहार के किसान का कोई भला नहीं है. ये हालात तब हैं जब चिराग पासवान के पास फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय है, उनके चाचा के पास भी था. लेकिन दोनों मंत्री किसानों की भलाई के लिए कुछ नहीं कर पाए.
द्विवेद्वी ने कहा कि सरकार के पास अब भी वक्त है. उसे मक्का आधारित प्रोसेसिंग प्लांट लगाना चाहिए. कम से कम मक्के का तेल और मुर्गी दाना बना कर भी किसान अपना पेट पाल सकते हैं. किसान को मक्के का रेट भी अच्छा मिलेगा, उसे एमएसपी के लिए भी नहीं तरसना पड़ेगा. पहले सरकार पहल तो करे.