
फल से लेकर सब्जी तक और गन्ना से लेकर मखाना तक, बिहार किसी भी राज्य से पिछड़ा नहीं. लेकिन बात जब फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट्स की होती है तो मामला शर्मिंदगी वाला हो जाता है. केंद्र सरकार ने साल 2021-2026 के लिए फूड प्रोसेसिंग की PLI स्कीम में 11000 करोड़ का बजट दिया जिसमें देश की 172 कंपनियों ने रुचि दिखाई. चौंकाने वाली बात ये है कि बिहार की हिस्सेदारी इसमें न के बराबर रही. वजह है फूड प्रोसेसिंग की बड़ी कंपनियों का नहीं होना क्योंकि अभी तक यह काम बहुत छोटे स्तर पर और अनऑर्गनाइज्ड तरीके से होता रहा है.
बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25 के अनुसार, बिहार में चावल के उत्पादन में 21% की बढ़ोतरी हुई है, जबकि गेहूं का उत्पादन 10.7% बढ़ा है. मक्के के उत्पादन में खास तौर पर जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई. 2020–21 से 2023–24 के बीच इसमें लगभग 66.6% की वृद्धि हुई. बिहार में बागवानी उत्पादन लगभग 230 लाख टन है, जिसमें फल और सब्जियां मुख्य हैं. इससे फूड प्रोसेसिंग के लिए कच्चे माल का एक बड़ा और महत्वपूर्ण आधार तैयार होता है.
लीची उत्पादन में राज्य देश में पहले स्थान पर है और भारत के कुल लीची उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 40% से ज्यादा है. राज्य भारत का 85% से ज्यादा मखाना पैदा करता है और सालाना लगभग 6,500 टन शहद उत्पादन के साथ देश में चौथे स्थान पर है. डेयरी के क्षेत्र में, बिहार में दूध का उत्पादन तो काफी होता है, लेकिन प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 230 ग्राम/दिन है, जो राष्ट्रीय औसत 427 ग्राम/दिन से काफी कम है. यह अंतर बताता है कि प्रोसेसिंग और डिस्ट्रीब्यूशन इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाकर इस कमी को कुछ हद तक दूर किया जा सकता है.
फूड प्रोसेसिंग उद्योग को खेती और फैक्ट्री के बीच एक मजबूत कड़ी माना जाता है. यह फसलों के खराब होने से होने वाले नुकसान को कम करता है, गांवों में रोजगार बढ़ाता है, किसानों की आमदनी बढ़ाता है और सामान को बाहर बेचने (निर्यात) में मदद करता है. लेकिन बिहार में यह कड़ी अभी तक पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाई है. हालांकि केंद्र की कई योजनाएं बिहार की इस कमजोर कड़ी को मजबूत कर सकती हैं जो पहले से कई राज्यों में चली आ रही हैं.
फूड प्रोसेसिंग पर आधारित रिसर्च पेपर The Rise of Food Processing Clusters in Bihar इस तथ्य को गंभीरता से उजागर करती है. रिपोर्ट बताती है, 2016-17 से चल रही प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY) के तहत, देश भर में आधुनिक फूड प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे मेगा फूड पार्क, कोल्ड चेन, एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर और फूड प्रोसेसिंग क्षमता बनाना या बढ़ाना) के लिए 6,000 करोड़ रुपये बांटे गए. बिहार में PMKSY की योजनाओं के तहत नौ प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई.
फूड प्रोसेसिंग के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम (PLISFPI) भी पहले से चली आ रही है. इस स्कीम का मकसद 2021-26 के दौरान 10,900 करोड़ रुपये के राष्ट्रीय बजट के साथ, दुनिया भर में मुकाबला करने लायक फूड मैन्युफैक्चरिंग चैंपियन बनाना और फूड एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना है. हालांकि देश भर में 172 कंपनियों को मंजूरी मिली है, लेकिन बिहार की कंपनियों की PLI में सीधी भागीदारी बहुत कम रही है. इससे पता चलता है कि राज्य में बड़े पैमाने पर फूड मैन्युफैक्चरिंग करने वाली कंपनियों की कमी है. PLI जैसी स्कीम का फायदा बड़ी कंपनियां उठाती हैं और माइक्रो और छोटे सेगमेंट की कंपनियां बाहर रह जाती हैं, जबकि बिहार में इन्हीं का दबदबा है.
इस स्कीम से साफ पता चलता है कि केंद्र सरकार ने फूड प्रोसेसिंग में राज्यों की मदद के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है. बस जरूरत है राज्य सरकारें इस अवसर को अपने मुताबिक इस्तेमाल करें. लेकिन अवसर को तभी भुनाया जा सकता है जब पहले से तय मानकों के मुताबिक काम करने वाली कंपनियां हों.
बात केवल फूड प्रोसेसिंग कंपनियों या फैक्ट्रियों की नहीं है. एक और बड़ी समस्या कोल्ड स्टोरेज (कोल्ड चेन) की कमी है. लीची, आम, सब्जियां और दूध जैसे जल्दी खराब होने वाले प्रोडक्ट के लिए कोल्ड स्टोरेज बहुत जरूरी होता है. इससे ही तय होता है कि इन चीजों को कितने समय तक सुरक्षित रखकर प्रोसेस किया जा सकता है और उनका सही दाम मिल सकता है. अगर कोल्ड स्टोरेज ना हो, तो मुजफ्फरपुर की जीआई टैग वाली मशहूर शाही लीची भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी कीमत पर नहीं बिक पाती. बिहार में बागवानी उत्पादन के हिसाब से कोल्ड स्टोरेज की सुविधा बहुत कम है. इसका नतीजा यह है कि कई बार अच्छी मशीनों से लैस फैक्ट्रियां भी समय पर अच्छा कच्चा माल नहीं जुटा पातीं, क्योंकि फसल उनके पास पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती है.
कोल्ड चेन की कमी से निर्यात (Export) भी प्रभावित होता है. जैसे लीची को विदेश भेजने के लिए खास तरह के ठंडे माहौल और रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट की जरूरत होती है, ताकि उसकी क्वालिटी बनी रहे. हालांकि, सरकार की योजनाओं के तहत कई कोल्ड चेन प्रोजेक्ट मंजूर किए गए हैं और मखाना बोर्ड को भी कोल्ड स्टोरेज बनाने की जिम्मेदारी दी गई है, फिर भी इन योजनाओं को जमीन पर पूरी तरह लागू करने में अभी काफी देरी हो रही है.