बिहार में खेती की पैदावार बढ़ी, फिर भी किसान परेशान—अब वैल्यू एडिशन ही समाधान

बिहार में खेती की पैदावार बढ़ी, फिर भी किसान परेशान—अब वैल्यू एडिशन ही समाधान

बिहार में पिछले डेढ़ दशक में कृषि उत्पादन ने रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की है—चाहे धान हो, मक्का, गेहूं, दूध या मछली. इसके बावजूद किसान खुशहाल नहीं हैं. वजह साफ है- उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन फूड प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन पर ध्यान नहीं दिया गया. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बिहार आलू, मखाना और मक्का जैसे उत्पादों पर आधारित प्रोसेसिंग हब विकसित करे, तो किसानों की आय में बड़ा बदलाव आ सकता है और राज्य दोबारा कृषि समृद्धि की राह पकड़ सकता है.

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रवि कांत सिंह
  • New Delhi ,
  • Jan 23, 2026,
  • Updated Jan 23, 2026, 9:35 AM IST

बिहार आजादी से पहले खाद्यान्न उत्पादन में नंबर वन था, लेकिन सभी संसाधनों के बावजूद पिछड़ गया क्योंकि कृषि प्रोडक्ट के वैल्यू एडिशन पर ध्यान नहीं दिया गया. यहां वैल्यू एडिशन का सीधा-सीधा मतलब फूड प्रोसेसिंग को मान सकते हैं. बिहार में फूड प्रोसेसिंग की अपार संभावनाओं के बावजूद कोई बड़ी फैक्ट्री नहीं लगी जबकि केंद्रीय मंत्री यहीं के हैं.  आज गुजरात कई मामलों में छोटा होने के बावजूद बिहार से आगे निकल गया. गुजरात जैसा छोटा प्रदेश फूड प्रोसेसिंग में बिहार को कई मोर्चों पर मात दे रहा है. ऐसे में सवाल है कि बिहार के सामने इस चुनौती से निपटने का समाधान क्या है. विशेषज्ञों की मानें तो बिहार सरकार अगर आलू हब, मखाना हब और मक्का हब बनाने पर फोकस करे तो यहां की खेती की हालत सुधर सकती है. केंद्र से भी भरपूर सहयोग मिलेगा.

बिहार का कृषि उत्पादन जबर्दस्त

इस रिपोर्ट में आगे बढ़ें उससे पहले एक बार बिहार के कृषि उत्पादन को देख लेते हैं. बिहार सरकार का आंकड़ा बताता है कि 2007-08 में, जब पहला एग्रीकल्चरल रोडमैप लॉन्च किया गया था, तब बिहार में प्रति हेक्टेयर 12.4 क्विंटल धान का उत्पादन होता था. यह आंकड़ा 2021-22 में बढ़कर 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया, जो पहले एग्रीकल्चर रोडमैप लागू होने के बाद से राज्य में प्रति हेक्टेयर अनाज के उत्पादन में लगभग दोगुना उछाल है.

इसी तरह, 2007-08 में मक्के का उत्पादन 27.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था. यह आंकड़ा 2021-22 में बढ़कर 52.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया. इस अवधि (2007-2022) के दौरान बिहार भारत में मक्के के एक प्रमुख उत्पादक के रूप में उभरा है. बिहार की मुख्य रबी फसल गेहूं का उत्पादन 2007-08 में 23.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था. यह 2021-22 में बढ़कर 30.8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया.

पहले एग्रीकल्चरल रोडमैप से पहले राज्य में हर साल 60 लाख टन दूध का उत्पादन होता था. यह 2021-22 में बढ़कर 115 लाख टन हो गया. एग्रीकल्चर रोडमैप लागू होने के बाद अंडे, मांस और मछली के उत्पादन में भी वृद्धि हुई.

2007-08 में, बिहार हर साल 100 लाख से अधिक अंडे का उत्पादन कर रहा था. यह 2021-22 में बढ़कर हर साल 300 ला से अधिक अंडे हो गया. मांस का उत्पादन 2007-08 में लगभग 2 लाख टन था और 2021-22 में बढ़कर 4 लाख टन हो गया.

हालांकि, सबसे बड़ी बढ़ोतरी मछली उत्पादन में देखी गई. 2007-08 में, बिहार का मछली उत्पादन 3 लाख टन था. यह 2021-22 में बढ़कर 7.6 लाख टन हो गया. पहले, बिहार बाहर से, खासकर आंध्र प्रदेश से आने वाली मछली पर निर्भर था. लेकिन आज, राज्य में किसानों के बीच मछली पालन लोकप्रिय हो गया है, जिसका नतीजा है कि मछली उत्पादन में तेज वृद्धि हुई है.

इतनी तगड़ी ग्रोथ, फिर फिसड्डी क्यों?

ऊपर के आंकड़े बताते हैं कि कृषि उत्पादन में बिहार अन्य राज्यों की तुलना में बहुत पीछे नहीं है. फिर सवाल है कि किसान क्यों रोने को विवश हैं? इसका जवाब है फूड प्रोसेसिंग जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी. बिहार में मक्का है, मखाना है और आलू से लेकर मछली तक है, लेकिन उसे प्रोसेस करने का साधन नहीं है. न ही गोदामों की सुविधा है. ऐसे में इन कृषि उत्पादों का वैल्यू एडिशन कैसे होगा. 

किसानों का आरोप है कि बिहार सरकार और फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय को वैल्यू एडिशन की कोई फिक्र नहीं है. अगर सरकार को वाकई चिंता होती तो प्रदेश में कई एग्रीकल्चर रोडमैप बने, सात निश्चय जैसे अभियान चले, लेकिन फूड प्रोसेसिंग पर कोई काम नहीं हुआ.

गुजरात कैसे निकला आगे

यहां बिहार की तुलना गुजरात से करने की जरूरत है. गुजरात ने फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में बहुत तेजी से काम किया है. खासकर आलू की प्रोसेसिंग में. आलू की फसल में मुनाफा बहुत अधिक है. अगर प्रोसेसिंग का सहारा लें तो एक रुपया खर्च कर 10 रुपये से अधिक कमाई की जा सकती है. लेकिन बिहार आलू की बंपर उपज के बावजूद इस कमाई से वंचित है क्योंकि प्रोसेसिंग प्लांट नहीं हैं. दूध से लेकर अंडे तक का यही हाल है. 

गुजरात सड़कों, बंदरगाहों और स्टोरेज में निवेश करता है. कोल्ड रूम और कोल्ड स्टोरेज कृषि प्रोडक्ट की बनावट और स्वाद की रक्षा करते हैं. समय पर लॉजिस्टिक्स की सुविधा मिलने से ऐसे प्रोडक्ट खराब होने से बच जाते हैं. गुजरात में अभी फूड प्रोसेसिंग, बेवरेज और तंबाकू प्रोसेसिंग में हजारों छोटे एंटरप्राइज हैं और फूड प्रोसेसिंग यूनिटों की संख्या भी हजारों में हैं. इन फैक्ट्रियों में राज्य के लाखों लोग काम करते हैं. दुनिया का सबसे बड़ा फूड प्रोसेसिंग ब्रांड अमूल, गुजरात में एक खास जगह रखता है.

गुजरात ने फूड और एग्रो-एक्सपोर्ट जोन बनाए हैं. प्राइवेट सेक्टर की इंडस्ट्रीज, बड़ी कोऑपरेटिव संस्थाओं और कमेटियों को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का दर्जा दिया है. प्रदेश में फसल विकास संस्थान बनाने के लिए सहायता देने का प्रावधान शुरू किया है. इसका नतीजा है कि किसानों की उपज का सही दाम मिल जाता है और व्यापारियों का बिजनेस भी चमक जाता है. 

कृषि, किसान की समस्या का समाधान

विशेषज्ञों और किसानों की राय है कि सरकार फूड चेन, प्रोसेसिंग यूनिट्स और वैल्यू एडिशन पर ध्यान दे. इसके लिए कच्चे माल की कोई कमी नहीं है. सरकार फूड प्रोसेसिंग शुरू करे तो बिहार के किसानों में दम है कि वे अपने प्रदेश को मखाना हब, मक्का हब और आलू हब बना सकते हैं. इस तरह के उपज की प्रचुर मात्रा है, लेकिन फैक्ट्रियां नहीं हैं. बिहार के साथ प्लस पॉइंट ये है कि अभी फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय भी उसी के पास है. जब इतना अच्छा संयोग है तो बिहार को आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है. लेकिन जरूरी है कि सरकार पहले कदम बढ़ाए, किसान साथ देने के लिए तैयार हैं.

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