
कहा जाता है कि 'ज़रूरत ही आविष्कार की जननी है',लेकिन जब इसके साथ किसी इंसान का सच्चा जज़्बा और दूसरों का दर्द महसूस करने वाला दिल जुड़ जाता है, तो एक असली हीरो का जन्म होता है.आज के दौर में गन्ने की खेती किसानों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है. बढ़ती लागत, मज़दूरों की कमी और मौसम की बेरुखी ने मुनाफे को काफी कम कर दिया है. पारंपरिक तरीके से एक एकड़ खेत में गन्ना बोने के लिए लगभग 25 से 30 क्विंटल बीज यानि गुल्लियां लग जाते हैं, जिसकी कीमत ही 10 से 13 हज़ार रुपये तक पहुंच जाती है. उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक अयोध्या ज़िले में ज़्यादातर छोटे और मझोले किसान हैं,जो इस भारी-भरकम खर्च से जूझ रहे थे.
इन्हीं संघर्षरत किसानों के बीच कन्हाई पुर गांव से उम्मीद की एक किरण बनकर उभरे ग्राम करनाईपुर विकास खंड तारुन, जिला अयोध्या के प्रगतिशील किसान राज बहादुर ने खेती की लागत घटाने की जद्दोजहद में उन्होंने साल 2020 में 'बड चिप' तकनीक को अपनाया. इसमें पूरे गन्ने की बुवाई के बजाय सिर्फ उसकी 'आंख यानि बड निकालकर नर्सरी तैयार की जाती थी. लेकिन इस तरीके में भी एक बड़ी खामी छिपी थी. बड निकालने वाली पुरानी मशीन पूरी तरह हाथों की ताक़त से चलती थी. इस थका देने वाले काम में ज़्यादातर गांव की गरीब महिलाएं लगी थीं. लगातार मशीन चलाने से उनके हाथ बुरी तरह सूज जाते थे, और हाथ में दर्द होता था और दिन भर पसीना बहाकर भी एक इंसान मुश्किल से सिर्फ गन्ने से 2500 बड ही निकाल पाता था.
राजबहादुर ने किसान तक को बताया की खेत में काम करने वाली उन बेबस महिलाओं की तकलीफ और उनके हाथों के छालों ने राज बहादुर को अंदर तक झकझोर दिया. जो दूसरों की तकलीफ को अपना मान ले.उन्होंने उसी दिन पक्का इरादा कर लिया कि इस थकाऊ प्रक्रिया का कोई आसान और मुकम्मल इंतज़ाम खोजना ही होगा. अपने इसी अटल संकल्प के साथ साल 2023 में उन्होंने अयोध्या के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) का रुख किया और वहां के प्रमुख डॉ. वी.पी. शाही से संपर्क साधा. डॉ.शाही के वैज्ञानिक मार्गदर्शन और अपनी ठेठ ज़मीनी सूझबूझ का इस्तेमाल करते हुए राज बहादुर ने दिन-रात एक कर दिया और आखिरकार अपनी मेहनत से बिजली से चलने वाला एक बेहद शानदार 'शुगरकेन सीड कटर' ईजाद कर दिया.है.
किसान राज बहादुर की बनाई यह नई मशीन देसी जुगाड़ और इंजीनियरिंग की एक ऐसी बेजोड़ मिसाल है, जिसे देखकर बड़े-बड़े विशेषज्ञ भी दांतों तले उंगली दबा लें.राजबहादुर ने किसान तक को बताया कि इस नायाब मशीन को बनाने के लिए उन्होंने आधा हॉर्सपावर (0.5 HP) की एक छोटी सी मोटर ली. इसके बाद अपनी समझदारी से मोटर की धुरी को दोनों तरफ बढ़ाकर उस पर लकड़ी काटने वाले तेज़ गोल ब्लेड सेट कर दिए. काम करने वालों की हिफाज़त के लिए ब्लेड के ऊपर लोहे का एक मज़बूत गार्ड लगा दिया गया, ताकि गन्ने का बुरादा उड़कर मज़दूर की आंखों या शरीर पर न पड़े. लगातार चलने पर मोटर गर्म न हो, इसके लिए मशीन के ऊपर एक छोटा पंखा भी फिट कर दिया. प्रगतिशील किसान राज बहादुर ने बताया कि इस सुगर केन सीड कटर मशीन को बनाने में महज़ 6,000 रुपये का खर्च आया.
इस नई मशीन के खेत में उतरते ही गन्ने की खेती में मानों एक नया सवेरा आ गया. इसने मज़दूरों की मेहनत और मालिक के खर्च, दोनों में भारी गिरावट ला दी. ज़रा सोचिए, पुरानी हाथ वाली मशीन से 13,000 बड निकालने में करीब 1500 रुपये की भारी-भरकम मज़दूरी चुकानी पड़ती थी. लेकिन, राज बहादुर के इस नए 'सीड कटर' से अब केवल दो लोग बिना किसी थकावट के, एक ही दिन में बेहद सफाई से 13,000 बड आसानी से निकाल लेते हैं. इसमें मज़दूरी के 600 रुपये और बिजली का बिल सिर्फ 50 रुपये आता है. यानी जिस काम में पहले 1500 रुपये खर्च होते थे, वो अब महज़ 650 रुपये में शानदार तरीके से पूरा हो जाता है.
इस मशीन ने राज बहादुर को महज़ एक आविष्कारक ही नहीं, बल्कि एक कामयाब एंटरप्रेन्योर भी बना दिया है। गन्ने की भारी लागत को मात देने के लिए उन्होंने एक नायाब तरकीब अपनाई है. अब इस मशीन से गन्ने की 'बड निकालकर उसे प्लास्टिक ट्रे में वर्मी कम्पोस्ट या कोकोपीट के साथ बोया जाता है. इससे एक एकड़ खेत के लिए महज़ 80 से 100 किलो बीज की ही ज़रूरत पड़ती है. इस तकनीक की बदौलत वे हर साल सर्दी और वसंत के मौसम में करीब 3 लाख बेहतरीन पौधे तैयार करते हैं। एक पौधा उगाने में सिर्फ 1.25 रुपये की लागत आती है, जिसे वे 2 रुपये में हाथों-हाथ बेचकर सालाना 2.25 लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं.
मुनाफे के साथ-साथ इस मशीन ने मज़दूरों की जिंदगी भी आसान कर दी है. पुरानी मैनुअल मशीन से काम करने वाली महिलाएं और मज़दूर भी अब बेहद खुश हैं,क्योंकि वे बिना किसी थकावट के एक ही दिन में बड़ी सफाई से ढेरों बड निकाल लेते हैं. राज बहादुर की इस शानदार कामयाबी को देखकर आस-पास के किसानों ने भी मशीन की मांग शुरू कर दी है. अब वे कृषि विज्ञान केंद्र, अयोध्या की मदद से अपनी इस ईजाद को पेटेंट करा रहे हैं, ताकि कोई बड़ा संस्थान इसे अपनाए और यह मशीन देश के कोने-कोने तक पहुंच सके.
अयोध्या की पावन धरती से शुरू हुई एक छोटे किसान की यह नायाब पहल आज उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों के लिए एक संजीवनी बूटी बन गई है. यह तकनीक देश के उन 50 लाख गन्ना किसान परिवारों के लिए एक सुनहरी उम्मीद है, जो करीब 60 लाख हेक्टेयर खेतों में पसीना बहाते हैं.यह मशीन ख़ासकर उन किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जो गेहूं या अन्य रबी फसलों की कटाई के बाद गन्ने की बुवाई करते हैं। राज बहादुर बताते हैं कि अगर वसंतकालीन गन्ने की बुवाई मार्च की जगह गेहूं कटने के बाद की जाती है, तो देरी के कारण गन्ने की पैदावार 20 से 25 फीसदी तक गिर जाती है और गन्ने में चीनी की रिकवरी भी घट जाती है.