चीनी संकट: आखिर क्या है असली वजह और कैसे बचेगी गन्ने की मिठास?

चीनी संकट: आखिर क्या है असली वजह और कैसे बचेगी गन्ने की मिठास?

सरकार ने माना है कि चीनी महंगी होने की मुख्य वजह गन्ने की पैदावार में आई भारी कमी है। साल 2025-26 में चीनी उत्पादन 343 लाख टन से गिरकर 306 लाख टन रह गया है सरकार इस गिरावट के लिए गन्ने की बीमारी 'रेड रॉट', टॉप बोरर कीड़ों और जलभराव को ज़िम्मेदार मानती है, हालांकि,विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि बाज़ार में चीनी के दाम बढ़ने के पीछे केवल लाल सड़न बीमारी ही इकलौती वजह नहीं है,बल्कि इसके पीछे कई अन्य अहम कारण भी जुड़े हैं,

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चीनी संकट: आखिर क्या है असली वजह और कैसे बचेगी गन्ने की मिठास?आखिर क्या है चीनी संकट की असली वजह ? फोटो :AI

हाल के हफ्तों में चीनी की कीमतों में आए तेज़ उछाल ने देश के हर आम आदमी का ध्यान अपनी तरफ खींचा है. महंगाई की सबसे बुनियादी वजह गन्ने की पैदावार में आई भारी गिरावट है.साल 2025-26 के सीज़न में चीनी उत्पादन का अनुमान पहले 343 लाख टन लगाया गया था, जो अब हकीकत के धरातल पर उतरकर महज़ 306 लाख टन रह गया है.सरकार ने पैदावार में आई इस कमी के लिए गन्ने की खतरनाक बीमारी ‘रेड रॉट’ टॉप बोरर कीड़ों के हमले और भारी बारिश से हुए जलभराव को ज़िम्मेदार माना है. लेकिन गन्ना विशेषज्ञों का साफ कहना है कि चीनी के महंगे होने के पीछे सिर्फ लाल सड़न ही इकलौती वजह नहीं है.आने वाले त्योहारों की भारी मांग, खराब मौसम, बाज़ार जमाखोरी सरकारी रेट के मुकाबले गन्ना क्रशर पर ज्यादा भाव और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की तेज़ हलचल का भी इसमें बड़ा हाथ है, 

साल 2025-26 के तीसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक, देश में लगभग 58.87 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती और करीब 50 करोड़ टन  पैदावार का अनुमान लगाया गया है.हालांकि, इस आंकड़े के सटीक आकलन के लिए फसल चक्र के दौरान बीमारियों, जलभराव और बढ़ते तापमान के प्रभाव पर पैनी नज़र रखनी होगी.साथ ही,यह भी बारीकी से देखना ज़रूरी है कि चीनी बनाने के अलावा गन्ने का कितना हिस्सा इथेनॉल, गुड़ और अन्य उत्पादों की तरफ मुड़ रहा है.किसानों की समस्या नहीं,अब यह एक 'राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है.

कागजी दावे बनाम जमीनी हकीकत

कृषि विशेषज्ञों और जमीनी हकीकत से जुड़े प्रगतिशील किसानों का स्पष्ट मानना है कि गन्ने की पैदावार के कागज़ी आंकड़े सच्चाई से कोसों दूर हैं. दरअसल, उत्पादन का मौजूदा आकलन महज़ बुवाई के क्षेत्रफल पर तय कर लिया जाता है.सही पैदावार आंकने के लिए सिर्फ बुवाई का डाटा हरगिज़ काफी नहीं है, बल्कि कटाई तक के पूरे सफर का बारीकी से हिसाब रखना ज़रूरी है.

इस लंबे सफर के दौरान फसल को भयानक बीमारियों, बेमौसम बारिश, बाढ़, जलभराव और बढ़ते तापमान की जबरदस्त मार झेलनी पड़ती है, जिससे गन्ने में चीनी की रिकवरी बुरी तरह गिर जाती है। इसके अलावा, गन्ने का एक बड़ा हिस्सा अन्य उत्पादों की तरफ मुड़ जाने से भी वास्तविक उत्पादन का गणित प्रभावित होता है.

विडंबना यह है कि इन तमाम वजहों से फसल को होने वाले भारी नुकसान को उत्पादन के असली आंकड़ों में शामिल ही नहीं किया जाता, ज़ाहिर है, जब तक पैदावार के इन आंकड़ों को पूरी तरह पारदर्शी नहीं बनाया जाएगा, तब तक ज़मीन पर सही नीतियां कभी लागू नहीं हो पाएंगी.

कैसे बिगड़ा चीनी का गणित ?

चीनी उत्पादन के शुरुआती अनुमान और वास्तविक पैदावार में जो 37 लाख टन का भारी अंतर आया है, वह इसी ज़मीनी हकीकत की अनदेखी का सीधा नतीजा है. इन्हीं हवा-हवाई कागजी आंकड़ों के भरोसे 31 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में कर दिया गया और 7 लाख टन चीनी का धड़ल्ले से एक्सपोर्ट कर दिया गया.

चूंकि हमारे देश में हर साल चीनी की घरेलू खपत करीब 280 लाख टन है, इसलिए इन गलत आकलनों से घरेलू आपूर्ति का पूरा संतुलन ही बुरी तरह बिगड़ गया. नतीजा यह हुआ कि घरेलू बाज़ार में अचानक चीनी की भारी कमी हो गई और अब स्थिति को संभालने के लिए हमें बाहर से इंपोर्ट करने की नौबत आ गई है. 

चीनी मिलों पर भारी पड़े गन्ना क्रशर 

खराब मौसम और बीमारियों के अलावा किसान ज़मीनी स्तर पर कई और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं. आज के वक़्त में चीनी मिलों के मुकाबले गन्ना क्रशर और कोल्हू पर गन्ने के ज़्यादा अच्छे दाम मिल रहे हैं. ऐसे में किसान अपना गन्ना मिलों को देने के बजाय सीधे तौर पर कोल्हू वालों को बेचना पसंद कर रहे हैं, वहां उन्हें तुरंत नकद भुगतान मिल जाता है और मिल के 400 रुपये के सरकारी रेट के मुकाबले 430 से 460 रुपये प्रति क्विंटल तक का ज़्यादा भाव भी मिल जाता है.इस नकद भुगतान का सीधा असर चीनी मिलों की सप्लाई चेन पर पड़ता है, जिससे मिलों में कुल उत्पादन और ज़्यादा गिर जाता है.

वही दूसरी तरफ उत्तर भारत में गन्ने की Co-0238  किस्म ने पिछले 10 से 12 सालों में एक शानदार कृषि क्रांति ला दी थी. बंपर उपज और मिलों में ज़्यादा चीनी रिकवरी के चलते किसानों ने इसे हाथों-हाथ अपनाया था. लेकिन एक ही किस्म को लगातार इतने बड़े पैमाने पर उगाने का  नतीजा यह हुआ कि एक दशक बाद यह शानदार किस्म रेड रॉट के सामने बेहद कमज़ोर पड़ गई.गन्ने के उत्पादन प्रभावित किया है .खेत की बीमारी इसी तरह सीधे आपकी रसोई तक पहुंचकर चीनी के दाम बढ़ा रही है.

क्या असली विलेन है 'रेड रॉट' ?

ज़मीनी हकीकत यह है कि गन्ने का कैंसर यानी रेड रॉट Co-0238 जैसी बेहतरीन किस्म को पूरी तरह निगल रहा है. किसानों का कहना है इसके कहर से पैदावार 80-90 क्विंटल से गिरकर महज़ 45-50 क्विंटल प्रति बीघा पर सिमट गई है, और अन्य किस्में भी बंपर उपज नहीं दे पा रही हैं। राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विवि पूसा बिहार के पौध सुरक्षा हेड डॉ. एस.के. सिंह बताते हैं कि इस बीमारी से 5 से 50% तक भारी आर्थिक नुकसान होता है। गन्ने का वज़न घटता है, रस सूखता है और मिठास मर जाती है। ज़ाहिर है, खेतों में गन्ने की रिकवरी गिरेगी तो बाज़ार में चीनी की किल्लत होना तय है। खेत की बीमारी इसी तरह सीधे आपकी रसोई तक पहुंचकर चीनी के दाम बढ़ा रही है।

महज़ किसानों की नहीं, यह है 'राष्ट्रीय समस्या'

गन्ना करोड़ों ग्रामीण परिवारों की रोज़ी-रोटी का ज़रिया है. इससे सिर्फ चीनी नहीं, बल्कि गुड़, एथेनॉल और बिजली भी बनती है. डॉ. सिंह के अनुसार, लाल सड़न और पैदावार के सही आंकड़ों को महज़ किसानों की समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता, इसे 'राष्ट्रीय मुद्दा' बनाना होगा. पैदावार गिरने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. गन्ना विभाग और किसानों के बीच पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए. साथ ही, डेटा ओवरलैपिंग रोकने के लिए चीनी मिलों और क्रशर की सप्लाई को कागज़ों पर बिल्कुल अलग-अलग रखा जाना चाहिए.

 ठोस नीति और तुरंत एक्शन जरूरी

डॉ. एस.के.सिंह ने कहा कि रेड रॉट का कोई जादुई इलाज नहीं है; बचाव ही इसकी असली रोकथाम है. किसानों को हर हाल में प्रमाणित और रोगमुक्त बीज अपनाने होंगे. पुरानी किस्म Co-0238 की जगह नई व उन्नत किस्मों को खोजकर किसानों के बीच उनका तेज़ी से प्रचार करना होगा.
जलवायु परिवर्तन और बेमौसम बारिश इस बीमारी को और तेज़ी से फैला रहे हैं. भारत की 'चीनी सुरक्षा' फैक्ट्री में नहीं, खेत में खड़े स्वस्थ गन्ने से शुरू होती है.अगर रोगमुक्त बीजों और गन्ने की सही पैमाइश को 'राष्ट्रीय अभियान' नहीं बनाया गया, तो चीनी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा.उपभोक्ता को महंगाई और किसान को बर्बादी से बचाने के लिए सरकार, मिलों और किसानों को आज, अभी और एक साथ मिलकर ज़मीनी एक्शन लेना ही होगा.

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