
जलकुंभी एक जलीय खरपतवार है जिसे 'बंगाल का आतंक' भी कहा जाता है. नदियों और तालाबों में जलकुंभी का आतंक खूब है. देश के हर राज्य में सरकार जलकुंभी को खत्म करने के लिए सैकड़ों करोड रुपये भी खर्च करती है. फिर भी इसका आतंक जारी है. जलकुंभी तेजी से फैलने वाला खरपतवार है जो जलीय जीवों के लिए ऑक्सीजन को रोक देता है. मच्छर के प्रजनन के लिए यह उपयुक्त परिवेश भी प्रदान करता है. गोरखपुर के एक समूह की महिलाओं ने इसी जलकुंभी को अपनी सफलता का आधार बना दिया. एकता आजीविका समूह की महिलाओं ने आज जलकुंभी से अलग-अलग 16 तरह के सामान बनाकर यह साबित कर दिया जहां चाह होती है वहीं राह होती है.
जलकुंभी को लंबे समय से एक खतरनाक खरपतवार के रूप में देखा जाता रहा है. यह तालाबों और नदियों में तेजी से फैलकर जल स्रोतों को प्रभावित करती है. इसे हटाने के लिए सरकार हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करती है. इसके बावजूद यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाती. लेकिन उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में कुछ महिलाओं ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया. उन्होंने जलकुंभी से ऐसे उत्पाद तैयार किए, जो न केवल उपयोगी हैं बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी हैं.
गोरखपुर की ‘लचीली खेती परियोजना’ के तहत काम करने वाली महिलाओं ने इस अनोखी पहल की शुरुआत की. ‘एकता आजीविका समूह’ से जुड़ी मंजू मौर्य और मुद्रावती देवी ने करीब दो साल पहले गोरखपुर एक्शन ग्रुप के सहयोग से जलकुंभी से उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग ली. आज इस समूह में 12 महिलाएं जुड़ चुकी हैं, जो मिलकर इस काम को आगे बढ़ा रही हैं और लगातार नए उत्पाद तैयार कर रही हैं.
यह समूह आज जलकुंभी से करीब 16 तरह के उत्पाद बना रहे हैं. इनमें डलिया, टोपी, टी-कोस्टर, सब्जी रखने की टोकरी, हैंडबैग, पेन होल्डर, रोटी बॉक्स और पानी की बोतल रखने के फोल्डर जैसे कई सामान शामिल हैं. इन उत्पादों की खास बात यह है कि ये पूरी तरह इको-फ्रेंडली, मजबूत और लंबे समय तक चलने वाले होते हैं. यही वजह है कि इनकी मांग अब गोरखपुर के अलावा अन्य शहरों में भी बढ़ रही है.
समूह की सदस्य मंजू मौर्य बताती हैं कि सबसे पहले वे तालाबों से जलकुंभी निकालती हैं. इसके बाद उसे अच्छी तरह सुखाया जाता है. सर्दियों में इसे सूखने में करीब एक सप्ताह का समय लगता है, जबकि गर्मियों में यह एक दिन में ही सूख जाती है. सूखने के बाद जलकुंभी को सीधा करके उससे अलग-अलग डिजाइन के उत्पाद तैयार किए जाते हैं. जलकुंभी का रेशा काफी मजबूत होता है, जिससे बने उत्पाद जल्दी खराब नहीं होते.
शुरुआत में जब ये महिलाएं तालाबों से जलकुंभी निकालती थीं, तो गांव के लोग उनका मजाक उड़ाते थे. लेकिन आज वही लोग उनके काम की सराहना कर रहे हैं. महिलाओं ने न केवल अपनी पहचान बनाई है, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि अगर सही सोच और मेहनत हो, तो बेकार समझी जाने वाली चीज भी कमाई का बड़ा जरिया बन सकती है.
समूह की सदस्य मुद्रावती देवी बताती हैं कि उनके बनाए उत्पादों की मांग अब लगातार बढ़ रही है. वे जलकुंभी से बने कोस्टर/कैप लगभग 350 रुपये में, पेन होल्डर 100 रुपये में और हैंडबैग 350 रुपये में बेचती हैं. इसके अलावा पानी की बोतल रखने के लिए 200 रुपये कीमत का फोल्डर भी तैयार किया गया है. इस काम से न केवल महिलाओं को अच्छी आमदनी हो रही है, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी रोजगार के नए अवसर खुल रहे हैं.
जलकुंभी से उत्पाद बनाने की यह पहल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक अहम कदम है. इससे तालाबों की सफाई होती है और जल स्रोतों की गुणवत्ता में सुधार आता है. जलकुंभी से उत्पाद बनाने का काम अब देश बिहार बंगाल और असम में तेजी से फैल रहा है. साथ ही, यह मॉडल ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भर बनने का एक सफल उदाहरण बनकर उभर रहा है.