
हरियाणा के यमुना नगर जिले के दंगला गांव के निवासी धर्मवीर कंबोज कभी दिल्ली की सड़कों पर दिन-रात रिक्शा चलाते थे, लेकिन एक दिन वो अपने गांव-घर लौटे... इसी के साथ शुरू हुई उनकी किसान बनने की कहानी. धर्मवीर कंबोज ने गांव पहुंचकर जैविक खेती शुरू की. एक रिक्शाचालक के किसान बनने का सफर धीरे-धीरे सफलता की राह पर चलने लगा. इसी के साथ ही उन्होंने अपने खेतों में उगाई सब्जियों की प्रोसेसिंग भी शुरू की और उसके लिए मशीनें भी बनाईं. अपने इस सफर में धर्मवीर कंबोज ने एक रिक्शा चालक से करोड़पति बनने तक का सफर तय किया है. उनकी इस सफलता ने इतने जोर से शाेर किया है कि वे राष्ट्रपति के मेहमान बन कर 20 दिनों तक राष्ट्र्पति आवास में रहे.
खेती और मार्केट को समझने वाला हर आदमी कहता है कि खेती से कमाई करनी है तो अनाज नहीं उसके प्रोडक्ट को बेचो. मसलन, गेहूं की जगह आटा तो फल की जगह जूस और जैम, लेकिन ये काम कैसे होगा, इसके बार में किसानों को जानकारी ठीक से नहीं मिल पाती है, लेकिन देश भर के किसान ये हुनर धर्मवीर कंबोज से सीख सकते हैं. वह एक सरल इंसान हैं, जिन्होंने कठिन हालात से लड़कर नया मुकाम हासिल किया.
किसान तक से बातची में धर्मवीर कंबोज ने बताया कि 1970 के दशक में परिवार की आर्थिक तंगी ने उन्हें पढ़ाई करने से रोक दिया. किसी तरह मैट्रिक तक की शिक्षा ली और रोजगार नहीं मिला तो दिल्ली आकर रिक्शा चलाने लगे. इस दौरान उन्होंने देखा कि कुछ यात्री, जिन्हें वह फेरी करते थे, दिल्ली के स्थानीय बाजार से प्रोसेसिंग फल उत्पादों, जैसे जूस और जैम को ऊंचे दामों पर बेचते हैं. इससे उनको समझ आ गया की किसानों को अधिक लाभ के लिए उपज नही उससे बने उत्पाद बेचने चाहिए. यह आइडिया उनके दिमाग में बैठ गया. रिक्शा चलाने के दौरान 1987 में वह सड़क दुर्घटना के शिकार हो गए, जिसकी वजह से उनको अपने गांव वापस आना पड़ा.
धर्मवीर कंबोज ने किसान तक से बातचीत में कहा कि उन्होंने घर आकर खेती करने का फैसला किया और उपज को प्रोसेस व कर ऊंचे दाम पर बेचने का विचार उनके मन में था. इसी पर उन्होंने अपना काम शुरू किया. इसी बीच उन्होंने जैविक खेती से संबंधित प्रयोग शुरू किए. उन्होंने कहा कि शुरुआत में मुश्किल हुई, लेकिन फिर खेती में मुनाफा होने लगा. एक दौर आया, जब एक एकड़ से उस समय 70 हजार की टमाटर बेची, इस सफलता के बाद वे मशरूम, स्ट्रॉबेरी की खेती भी किया, जिससे उनको मुनाफा हुआ, उससे अपने पुराने कर्ज चुकाए. इसके बाद पूरा ध्यान खेती पर लगाया और सब्जी फसलों की खेती के साथ औषधि फसल, एलोवेरा, तुलसी की खेती आधुनिक तरीके से किया .
धर्मवीर कंबोज ने किसान तक से अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि 2004 में एक बार उनके गांव के किसान अजमेर गए. जिसमें वे भी शामिल थे, वहां उन्होंने देखा कि वहां महिलाएं आंवले की मिठाई बना रही थीं और वो एलोवेरा की प्रोसेसिंग के बाद उसका अर्क निकाल रही थी. उन्हों ने बताया कि वहां के किसानों से बात कर अर्क के बारे में जाना और उसके बारे में विस्तार से जानकारी ली. इसके बाद उन्हें अहसास हुआ कि किसी भी सब्जी, फल, फूल आदि की खेती में फायदा तब होता है, जब किसान अपनी उपज को सीधे बाजार में बेचने के बजाय उसे प्रोसेस कर उत्पाद बनाकर बेचता है. इसके बाद धरमवीर ने अपने उपज का प्रोसेसिंग करने निर्णय लिया, इसके बाद उन्हें खुद की मशीन बनाने का खयाल आया. वो कहते हैं कि मैंने पढ़ाई में भले ही अच्छा नहीं था, लेकिन जुगाड़ से छोटी-मोटी मशीन बनाने का शौक हमेशा से रहा है. इसके बाद वह एलोवेरा और अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों रूप में बाजार में बेचने के तरीकों की तलाश करने लगे .
धर्मवीर ने बताया कि उन्होंने पहले जरूरत के हिसाब से एक मशीन का स्केच बनाया और फिर एक स्थानीय मैकेनिक से संपर्क किया. उस मैकेनिक ने उस मशीन को बनाने के लिए 35 हजार रुपये मांगे तो उन्होंने 20 हजार रुपये देकर मशीन बनाने का शूरू करवाया. इस मशीन को बनाने में 8 से 9 महीने का समय लगा. उन्होंने अपनी मशीन का नाम 'मल्टी प्रोसेसिंग मशीन' रखा. इसके बाद उपज को प्रोसेस किया और एलोवेरा, तुलसी का रस निकाला और बाजार तक खुद अपनी पहुंच बनाई.धर्मवीर ने कहा कि उन्होंने बने बनाए पैटर्न पर काम नहीं किया, बल्कि अपनी जरूरत के मुताबिक ऐसी मशीन बनाई, जो कई तरह की उपज का प्रोसेसिंग करने में सक्षम है.
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इसके साथ ही धर्मवीर के मल्टीपर्पज फूड प्रोसेसिंग मशीन से एलोवेरा का जूस निकालने, सब्जियों का छिलका उतारने, कटाई करने, उबालने और जूस बनाने तक का काम किया. कंंबोज ने बताया कि वे तुलसी का तेल, सोयाबीन का दूध, हल्दी का अर्क तैयार करते हैं. गुलाब जल, जीरे का तेल, पपीते और जामुन का जैम आदि सहित कई उत्पाद तैयार करते हैं. हाल ही में लहसुन छिलने वाली मशीन बनाई है, जो 1 घंटे में 200 किलो लहसुन छिलती है. इसके अलावा मक्का से दूध निकालने की एक मशीन बनाई है. फिलहाल धर्मवीर सालाना दो करोड़ कमा रहे हैं.
धर्मवीर कंबोज को 2009 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन द्वारा सम्मानित किया गया था. उन्होंने इन मल्टी-पर्पस फूड प्रोसेसिंग मशीनों का पेटेंट भी कराया है. धर्मवीर कंबोज की मशीनों की मांग जिम्बाब्वे, अफ्रीका, नाइजीरिया, युगांडा जैसे देशों में है, जिन्हें वे आपूर्ति कर रहे हैं. कंबोज का बताया कि कई बेरोजगार उनकी मशीनें खरीदकर फूड प्रोसोसिंग का रोजगार कर रहे है. उनकी बनाई हुई प्रोसेसिंग मशीनों को महिलाओं ने खरीदकर कोरोना के संकट काल में फल और सब्जियों की प्रोसेसिंग कर उसे बेचकर लाभ कमाया.
जब धर्मवीर का आइडिया हिट कर गया और उनकी औषधीय खेती की उपज और उसकी प्रोसेसिंग वाली मशीन ने कामयाबी के आसमान छुआ तो उन्हें प्रसिद्धि मिलती चली गई और एक से एक अवार्ड उनकी झोली में आए और वो 20 दिनों तक राष्ट्रपति का मेहमान बनकर राष्ट्रपति भवन मे रहे. धर्मवीर ने सिर्फ पैसा, नाम और अवार्ड ही नहीं कमाया,बल्कि अब वो विश्वविद्यालयों में और दूसरे सेंटर्स पर छात्रों - किसानों और महिलाओं को ट्रेनिंग भी देते हैं, जिससे कि अपना रोजगार कर सके.