पिता बेचते हैं दूध, बेटे ने अमेरिका में लहराया तिरंगा, लकड़ी के भाले से शुरू हुआ था आशीष का सफर

पिता बेचते हैं दूध, बेटे ने अमेरिका में लहराया तिरंगा, लकड़ी के भाले से शुरू हुआ था आशीष का सफर

मिर्जापुर के मवैया गांव के आशीष यादव ने अमेरिका में आयोजित U-20 वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में जैवलिन थ्रो में सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया. आशीष ने गांव के सूखे तालाब में लकड़ी के भाले से अभ्यास शुरू किया था. किसान परिवार से आने वाले आशीष की मेहनत और संघर्ष की कहानी युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा है.

किसान का बेटा बना वर्ल्ड चैंपियनशिप का सिल्वर विजेताकिसान का बेटा बना वर्ल्ड चैंपियनशिप का सिल्वर विजेता
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  • Mirzapur,
  • Aug 13, 2026,
  • Updated Aug 13, 2026, 8:07 PM IST

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के एक छोटे से गांव से निकलकर आशीष यादव ने अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर देश का नाम रोशन किया है. मवैया गांव के रहने वाले आशीष यादव ने अमेरिका के यूजीन में आयोजित वर्ल्ड एथलेटिक्स U-20 चैंपियनशिप में पुरुषों की जैवलिन थ्रो स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीता है. खास बात यह है कि आशीष ने जैवलिन थ्रो की शुरुआत किसी बड़े स्टेडियम या महंगे खेल उपकरण से नहीं की थी. उन्होंने गांव में लकड़ी के भाले से अभ्यास शुरू किया था. उनकी मेहनत और परिवार के सहयोग ने उन्हें गांव के मैदान से विश्व मंच तक पहुंचा दिया.

सूखे तालाब में लकड़ी के भाले से शुरू हुआ सफर

आशीष यादव मिर्जापुर की सदर तहसील के मवैया गांव के रहने वाले हैं. उनके पिता अजय यादव किसान हैं और परिवार चलाने के लिए दूध बेचते हैं. घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन आशीष के सपने बड़े थे.

आशीष ने साल 2022 के आसपास जैवलिन थ्रो की तैयारी शुरू की. शुरुआत में उनके पास अभ्यास के लिए न तो कोई बड़ा मैदान था और न ही महंगे खेल उपकरण. उन्होंने गांव के पास सूखे तालाब में लकड़ी के भाले से भाला फेंकने का अभ्यास किया. कई बार कठिन परिस्थितियों के बीच भी वह अपने लक्ष्य पर टिके रहे.

चाचा से मिली खेल की प्रेरणा

आशीष के परिवार में पहले से ही खेल का माहौल रहा है. उनके चाचा धर्मराज यादव अंतरराष्ट्रीय स्तर के डिस्कस थ्रो खिलाड़ी रह चुके हैं. आशीष ने भी अपने चाचा को देखकर खेल की तरफ कदम बढ़ाया.

चाचा से मिली प्रेरणा और अपनी मेहनत के दम पर आशीष ने धीरे-धीरे जैवलिन थ्रो में अपनी पहचान बनानी शुरू की. गांव में अभ्यास के बाद वह कोच के साथ चनईपुर स्थित मैदान में ट्रेनिंग करने लगे. जब परिवार ने उनकी प्रतिभा और मेहनत देखी तो उन्होंने भी आशीष का पूरा साथ देना शुरू कर दिया.

स्टेट लेवल पर जीता पहला मेडल

आशीष की मेहनत का नतीजा जल्द ही दिखाई देने लगा. उन्होंने पहली बड़ी सफलता स्टेट लेवल की प्रतियोगिता में मेडल जीतकर हासिल की. इसके बाद उनका चयन हरियाणा के हिसार स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण यानी SAI के प्रशिक्षण केंद्र में हुआ.

हिसार पहुंचने के बाद आशीष को बेहतर ट्रेनिंग, मैदान और खेल से जुड़ी सुविधाएं मिलीं. यहां उन्होंने अपनी तकनीक और प्रदर्शन को और बेहतर किया. इसी मेहनत के दम पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए जगह बनाई.

अमेरिका में रचा इतिहास

आशीष यादव ने अमेरिका के यूजीन में आयोजित वर्ल्ड एथलेटिक्स U-20 चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया. पुरुषों की जैवलिन थ्रो स्पर्धा में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए सिल्वर मेडल अपने नाम किया. यह उनके करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक है.

आशीष की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि U-20 वर्ल्ड चैंपियनशिप में पुरुषों की जैवलिन थ्रो में इससे पहले भारत के लिए नीरज चोपड़ा ने 2016 में गोल्ड मेडल जीता था. आशीष इस प्रतियोगिता में जैवलिन थ्रो का मेडल जीतने वाले दूसरे भारतीय बने हैं.

पिता आज भी बेचते हैं दूध, बेटे ने देश का नाम किया रोशन

आशीष की सफलता के पीछे उनके परिवार का बड़ा योगदान है. उनके पिता अजय यादव खेती के साथ दूध बेचकर परिवार का खर्च चलाते हैं. सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने बेटे के खेल को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

परिवार के सदस्य रविंद्र यादव बताते हैं कि उन्हें पहले से उम्मीद थी कि आशीष बड़ी प्रतियोगिता में अच्छा प्रदर्शन करेगा. उन्होंने बताया कि शुरुआत में आशीष को लकड़ी का भाला दिलाया गया था. गांव के सूखे तालाब में गर्मियों के दौरान वह अभ्यास करता था. इसके बाद स्टेट लेवल पर मेडल जीतने के बाद उसे हिसार के SAI हॉस्टल में ट्रेनिंग का मौका मिला.

परिवार में पहले से हैं दो अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी

आशीष की उपलब्धि से पूरा परिवार बेहद खुश है. खास बात यह है कि उनके परिवार में पहले से ही दो अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं. आशीष के चाचा धर्मराज यादव अंतरराष्ट्रीय डिस्कस थ्रो खिलाड़ी हैं, जबकि धर्मराज यादव की पत्नी पूनम यादव अंतरराष्ट्रीय कुश्ती खिलाड़ी हैं.

अब आशीष यादव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर इस परिवार की खेल परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. परिवार के लिए यह गर्व की बात है कि एक ही परिवार से तीन खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके हैं.

गांव के भाले से विश्व मंच तक पहुंचा आशीष

आशीष यादव की कहानी सिर्फ एक मेडल जीतने की कहानी नहीं है. यह बताती है कि अगर मेहनत और लगन हो तो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं. जिस खिलाड़ी ने कभी गांव के सूखे तालाब में लकड़ी के भाले से अभ्यास शुरू किया था, वही आज अमेरिका में भारत के लिए सिल्वर मेडल जीत चुका है.

आशीष की यह सफलता मिर्जापुर ही नहीं, बल्कि देश के उन हजारों युवाओं के लिए भी प्रेरणा है जो छोटे शहरों और गांवों में रहकर खेलों में बड़ा नाम कमाने का सपना देखते हैं. अब आशीष के सामने आगे की कई प्रतियोगिताएं हैं और परिवार को उम्मीद है कि आने वाले समय में वह देश के लिए और भी बड़े पदक जीतेंगे.

नीरज चोपड़ा से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ रहे आशीष

भारतीय जैवलिन स्टार नीरज चोपड़ा आशीष के लिए प्रेरणा रहे हैं. आशीष की तरह नीरज ने भी भारतीय जैवलिन को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई है. अब आशीष की U-20 वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल की उपलब्धि भारतीय जैवलिन के लिए एक नई उम्मीद के रूप में देखी जा रही है.

आशीष ने जिस तरह बेहद सामान्य परिस्थितियों से निकलकर विश्व मंच तक का सफर तय किया है, वह बताता है कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों या बड़े स्टेडियमों में पैदा नहीं होती. कई बार वह गांव के किसी सूखे तालाब में लकड़ी के भाले के साथ भी अपना सफर शुरू करती है. (सुरेश कुमार सिंह का इनपुट)

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