
गुजरात में किसान अब खेती के पुराने और प्राकृतिक तरीकों की ओर तेजी से लौट रहे हैं. कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (ATMA) परियोजना की मदद से राज्य के कई किसान गाय आधारित प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं. इस विधि से जहां खेती की लागत कम हो रही है, वहीं मिट्टी की क्वालिटी में भी सुधार देखने को मिल रहा है. दाहोद जिले के किसान नरेंद्रभाई हटिला इसका एक उदाहरण हैं, जिन्होंने प्रशिक्षण लेने के बाद प्राकृतिक खेती को अपनाया और एक सफल किसान बन गए.
दाहोद जिले के नरेंद्रभाई हटिला पिछले कई वर्षों से गाय आधारित प्राकृतिक खेती कर रहे हैं. उन्होंने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल बंद कर दिया है. अब वे देसी गाय के गोबर और मूत्र से तैयार किए गए प्राकृतिक खाद जैसे जीवामृत और घन जीवामृत का उपयोग करते हैं. नरेंद्रभाई के अनुसार, प्राकृतिक खेती में खर्च काफी कम आता है और इससे मिट्टी की उर्वरता भी धीरे-धीरे बढ़ती है. उन्होंने बताया कि एक देसी गाय की मदद से करीब 30 एकड़ जमीन पर प्राकृतिक खेती की जा सकती है. इस पद्धति से न सिर्फ किसानों का खर्च कम होता है, बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए भी यह फायदेमंद है.
ATMA परियोजना के तहत प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन मिलने के बाद नरेंद्रभाई ने अपने खेत में पांच परत वाला मॉडल फार्म तैयार किया है. इसमें बागवानी फसलें, सब्जियां और फल उगाए जाते हैं. खास बात यह है कि इन फसलों में रासायनिक खाद और दवाओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता. ATMA परियोजना के तालुका परियोजना प्रबंधक चेतन कुमार राठौड़ ने बताया कि नरेंद्रभाई पिछले सात वर्षों से इस योजना से जुड़े हुए हैं. उन्हें जिला स्तर पर प्रशिक्षण, मॉडल फार्म और खेती से जुड़ी तकनीकी सहायता दी गई है. प्राकृतिक खेती अपनाकर वे कम लागत में अच्छी कमाई कर रहे हैं.
दाहोद स्थित ATMA परियोजना के प्रौद्योगिकी प्रबंधक रामसिंह चौहान ने बताया कि धनपुर तालुका में गाय आधारित प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को हर साल 10,800 रुपये की आर्थिक सहायता भी दी जाती है. इसके अलावा किसानों को जीवामृत, घन जीवामृत, अग्नि अस्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसे प्राकृतिक उत्पाद तैयार करने की जानकारी दी जाती है. किसानों की सुविधा के लिए जैव संसाधन केंद्र (BRC) भी बनाए गए हैं, जहां प्राकृतिक खेती से जुड़े सामान उपलब्ध कराए जाते हैं. मिशन क्लस्टर योजना के तहत BRC इकाई बनाने के लिए किसानों को 1 लाख रुपये तक की सहायता दी जाती है, जबकि गैर-मिशन श्रेणी में 60 हजार रुपये तक की मदद दी जाती है.
गुजरात में गाय आधारित प्राकृतिक खेती अब किसानों के लिए कम लागत और बेहतर उत्पादन का विकल्प बन रही है. इससे मिट्टी की सेहत सुधर रही है, खेती में खर्च घट रहा है और किसानों को अधिक टिकाऊ तरीके से आय बढ़ाने का मौका मिल रहा है. प्राकृतिक खेती का यह मॉडल आने वाले समय में अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है. (ANI)