खाद की कीमतों में भारी उछाल, क्या आम आदमी की थाली हो सकती है महंगी?

खाद की कीमतों में भारी उछाल, क्या आम आदमी की थाली हो सकती है महंगी?

आर्थिक संस्था कैपिटल इकोनॉमिक्स का कहना है कि अब तक दुनिया की नजरें ऊर्जा की कीमतों पर टिकी थीं, लेकिन असली खतरा अब खेती में इस्तेमाल होने वाले यूरिया पर पड़ने लगा है.

खाद की कीमतों में भारी उछाल (AI- तस्वीर)खाद की कीमतों में भारी उछाल (AI- तस्वीर)
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Apr 30, 2026,
  • Updated Apr 30, 2026, 11:42 AM IST

दुनिया में एक बार फिर खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है, जो सीधे हमारी थाली पर असर कर सकता है. वजह है पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, जिसका असर अब सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खेती-किसानी पर भी पड़ने लगा है. दरअसल, खेतों में जान डालने वाले नाइट्रोजन आधारित उर्वरक खासकर यूरिया की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं. हालात ऐसे हैं कि बाजार में खाद सप्लाई कितनी है, इसका सही अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो गया है. इसी वजह से ट्रेडिंग और हेजिंग गतिविधियां बढ़ रही हैं, जिससे कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है.

आर्थिक संस्था कैपिटल इकोनॉमिक्स का कहना है कि अब तक दुनिया की नजरें ऊर्जा की कीमतों पर टिकी थीं, लेकिन असली खतरा अब खेती में इस्तेमाल होने वाले यूरिया पर पड़ने लगा है. अगर यूरिया और अन्य उर्वरकों की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो इसका सीधा असर अगले 15 महीनों में खाने-पीने की चीजों पर दिख सकता है.

खाद की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी

संघर्ष शुरू होते ही खाद की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. सिर्फ यूरिया ही नहीं, बल्कि पूरे नाइट्रोजन-आधारित फर्टिलाइजर महंगे हो गए हैं. रिसर्च एजेंसी BMI के मुताबिक, अमेरिका के गल्फ इलाके में इस्तेमाल होने वाला DAP (डायअमोनियम फॉस्फेट) 20 अप्रैल को 723 डॉलर प्रति टन पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 13 फीसदी ज्यादा है. वहीं, यूरिया की कीमतों में तो और भी तेज उछाल देखने को मिला है. 27 फरवरी से 20 अप्रैल के बीच इसकी कीमत करीब 50 फीसदी बढ़कर 693 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई. यानी साफ है, खाद महंगी हो रही है, और इसका असर जल्द ही खेती और फिर आम लोगों की जेब पर दिख सकता है.

पश्चिम एशिया में हालात बिगड़ने का सीधा असर खाद की कीमतों पर दिख रहा है. वहां का “फ्रंट-मंथ कॉन्ट्रैक्ट” यानी तुरंत डिलीवरी वाला सौदा करीब 76 फीसदी उछलकर 850 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया. इस तेजी की बड़ी वजह है Strait of Hormuz का लगभग बंद हो जाना. ये दुनिया के लिए बेहद अहम समुद्री रास्ता है. इसके बंद होने से यूरिया की ग्लोबल सप्लाई का करीब एक-तिहाई हिस्सा अटक गया है.

चीन में नहीं दिख रहा खाद का संकट

रिसर्च एजेंसी BMI के अनुसार, 2026 में मिडिल ईस्ट में यूरिया की औसत कीमत करीब 586 डॉलर प्रति टन रहने का अनुमान है. हालांकि, साल भर में इसमें काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. दूसरी तिमाही (Q2) में कीमतें बढ़कर लगभग 716 डॉलर प्रति टन तक पहुंच सकती हैं, इसके बाद तीसरी तिमाही (Q3) में घटकर करीब 592 डॉलर प्रति टन और साल के अंत तक चौथी तिमाही (Q4) में लगभग 510 डॉलर प्रति टन रह सकती हैं.संयुक्त राष्ट्र की संस्था खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की कृषि विपणन सूचना प्रणाली (AMIS) के मुताबिक, मार्च 2026 में खेती से जुड़े बाजार संकेतकों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई. यह इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर नाइट्रोजन और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों की सप्लाई में कमी बढ़ रही है. हालांकि, इस पूरी स्थिति में चीन एक अपवाद के रूप में सामने आया है, जहां बाकी दुनिया के मुकाबले इस तंगी का असर कम देखने को मिला है.

यूरोप में हालात काफी खराब

यूरोप में हालात काफी खराब होते दिख रहे हैं. फ्रांस में गेहूं के लिए उर्वरक की लागत अपने सामान्य स्तर से करीब 139 फीसदी ज्यादा हो गई है. सिर्फ एक महीने में ही इसमें 46 अंकों की बढ़ोतरी हुई है, और यह फरवरी 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. वहीं अमेरिका में मक्के की खेती के लिए उर्वरक की लागत भी तेजी से बढ़ी है. अब यह सामान्य स्तर से 139 फीसदी ऊपर पहुंच गई है, जबकि फरवरी में यह करीब 83 फीसदी ही थी. दूसरी तरफ ब्राजील में सोयाबीन की खेती पर इसका असर ज्यादा नहीं दिख रहा. वहां उर्वरक की लागत में सिर्फ हल्की बढ़ोतरी हुई है, जिससे साफ है कि सोयाबीन पर नाइट्रोजन की कीमतों के उतार-चढ़ाव का असर बाकी फसलों के मुकाबले कम पड़ता है.

सप्लाई ठीक होने में लगेगा समय

आर्थिक संस्था कैपिटल इकोनॉमिक्स के मुताबिक, इस बार हालात रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे अचानक झटके वाले नहीं होंगे. असर धीरे-धीरे सामने आएगा, लेकिन कम आय वाले देशों के लिए यह ज्यादा भारी पड़ सकता है. इस पूरे संकट का सबसे ज्यादा असर नाइट्रोजन वाले उर्वरकों पर पड़ा है, क्योंकि इन्हें बनाने में बहुत ज्यादा ऊर्जा लगती है और ये काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर होते हैं. ऐसे में जैसे-जैसे ऊर्जा महंगी होती है, वैसे-वैसे खाद भी महंगी हो जाती है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भले ही समुद्री रास्ते दोबारा खुल जाएं, लेकिन जिन बड़े उत्पादन केंद्रों को नुकसान पहुंचा है, वहां कामकाज को जल्दी सामान्य करना आसान नहीं होगा. यानी सप्लाई पूरी तरह ठीक होने में समय लगेगा. वहीं, रिसर्च एजेंसी BMI का कहना है कि इस तनाव की वजह से बाजार में हेजिंग (जोखिम से बचाव) का तरीका भी बदल गया है. पश्चिम एशिया से सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता के चलते वहां की कीमतें अमेरिका के गल्फ क्षेत्र के मुकाबले करीब 23 फीसदी ज्यादा हो गई हैं, जबकि 2024 में यह अंतर सिर्फ 6 फीसदी के आसपास था.

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