
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और दुनिया के बाजार में खाद और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के चलते भारत की खाद सब्सिडी पर दबाव बनता दिख रहा है. आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, यदि मौजूदा हालात बने रहते हैं तो वित्त वर्ष 2027 में खाद सब्सिडी का कुल बिल 3 लाख करोड़ रुपये से पार जा सकता है, जो बजट में रखे गए अनुमान से लगभग दोगुना होगा.
सरकार ने चालू वित्त वर्ष के बजट में खाद सब्सिडी के लिए 1.7 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया था. इसमें यूरिया के लिए 1.16 लाख करोड़ रुपये और फॉस्फोरस, पोटाश के लिए 54,000 करोड़ रुपये शामिल हैं. हालांकि, मौजूदा हालातों को देखते हुए अधिकारियों का कहना है कि वास्तविक खर्च इस अनुमान से काफी अधिक निकल सकता है. इससे पहले, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए संशोधित अनुमान 1.86 लाख करोड़ रुपये था.
मामले से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिया कि अगर कीमतों में उछाल और सप्लाई में बाधाएं खरीफ सीजन तक जारी रहती हैं तो सब्सिडी का आंकड़ा 3 लाख करोड़ पार कर सकता है. वहीं, यदि यही स्थिति रबी सीजन तक बनी रही तो यह बोझ 3.5 लाख करोड़ तक पहुंचने की भी आशंका है.
इस भारी-भरकम दबाव की मुख्य वजह पश्चिम एशिया में बढ़ा तनाव है, जिसने खादों और कच्चे माल की सप्लाई चेन को प्रभावित किया है. खासतौर पर होर्मुज स्ट्रेट के आसपास की स्थिति को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं, जहां किसी भी तरह की रुकावट वैश्विक सप्लाई पर असर डाल सकती है. भारत अपनी खाद जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल का सीधा असर देश के सब्सिडी बिल पर पड़ता है.
पिछले कुछ हफ्तों में वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है. फरवरी 2026 के अंत में लगभग 482 डॉलर प्रति टन रही कीमतें अप्रैल की शुरुआत में बढ़कर करीब 795 डॉलर प्रति टन पहुंच गईं. हालिया आयात टेंडरों में तो ये कीमतें और बढ़कर 935-959 डॉलर प्रति टन तक दर्ज की गईं. यह लगभग 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी को दर्शाता है.
इसी तरह, यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख कच्ची सामग्री LNG की कीमतों में भी भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है. फरवरी के अंत में जहां इसकी कीमत लगभग 10.4 डॉलर प्रति MMBtu थी, वहीं मार्च की शुरुआत में यह बढ़कर 25.4 डॉलर प्रति MMBtu तक पहुंच गई. मई की शुरुआत तक कीमतें कुछ नरम होकर करीब 17.4 डॉलर प्रति MMBtu पर आईं, लेकिन अब भी ये सामान्य स्तर से काफी ऊपर बनी हुई हैं.
इन परिस्थितियों को देखते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में कहा कि पश्चिम एशिया संकट के बाद वैश्विक खाद कीमतों में “बड़ा उछाल” आया है. उन्होंने देशवासियों से मौजूदा हालात में “3Fs”—ईंधन, उर्वरक और विदेशी मुद्रा—के सोच समझ कर उपयोग की अपील भी की.
सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ स्तरों पर कदम भी शुरू किए हैं. सूत्रों के अनुसार, सरकार खादों की सप्लाई बनाए रखने के लिए वैकल्पिक वैश्विक स्रोतों की तलाश कर रही है, ताकि पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम की जा सके. रूस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ाने के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है. इसके अलावा, सब्सिडी ढांचे की लगातार समीक्षा और जरूरत अनुसार अतिरिक्त बजटीय संसाधन उपलब्ध कराने की तैयारी भी की जा रही है.
नीति आयोग भी इस मुद्दे पर सक्रिय हो गया है. आयोग के सदस्य के.वी. राजू ने हाल ही में विशेषज्ञों और थिंक टैंकों से कहा कि वे लंबे दिनों के सुझावों के बजाय तत्काल लागू होने वाली रणनीति पेश करें. उनका जोर इस बात पर रहा कि खरीफ बुवाई के पहले ही ठोस निर्णय लिए जाएं, ताकि किसानों को किसी तरह की कमी या कीमतों के झटके का सामना न करना पड़े.
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराना और दूसरी तरफ सरकार के वित्तीय भार को नियंत्रित रखना. ऐसे में आने वाले महीनों में सरकार की नीतियां और वैश्विक बाजार की दिशा, दोनों ही इस सब्सिडी के अंतिम आकार को तय करेंगी.