
भारत में उगाई जाने वाली सब्जियों में से प्याज एक बहुत ही महत्वपूर्ण सब्जी है. यही वजह है कि मार्केट में प्याज की मांग हमेशा बनी रहती है. वहीं, प्याज के बगैर टेस्टी सब्जी की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. खरीफ और रबी दोनों सीजन के दौरान किसान बड़े स्तर पर प्याज की खेती करते हैं. लेकिन रबी सीजन में बोई गई प्याज में फरवरी महीने में मौसम में बदलाव के कारण उखड़ा रोग लगने का खतरा बना रहता है. ये रोग प्याज की फसल के लिए बहुत खतरनाक होता है. जिससे फसलों को भारी नुकसान होता है. ऐसे में बिहार के प्यजा किसानों के लिए बिहार कृषि विभाग ने एक एडवाइजरी जारी की है, जिसमें बताया गया है कि किसान इस महीने प्याज की फसल में क्या करें, और साथ ही ये भी बताया है कि उखड़ा रोग से फसलों को कैसे बचाएं. आइए जानते हैं आसान टिप्स.
पत्तियों में पीलापन: प्याज में उखड़ा रोग लगने पर पौधे की पुरानी पत्तियां सबसे पहले पीली पड़ती हैं, फिर सूखकर नीचे की ओर मुड़ने लगती हैं.
जड़ों और कंद की सड़न: इस रोग के लगने पर जड़ें गल जाती हैं, जिससे पौधा आसानी से जमीन से उखड़ जाता है, इसलिए इस रोग को उखड़ा रोग कहते हैं.
फसलों में सफेद फफूंद: उखड़ा रोग लगने पर कंद के निचले हिस्से और जड़ों के पास सफेद रंग की फफूंद की परत दिखाई देती है, जिस पर छोटे काले रंग के दाने भी दिखते हैं.
फसल में बदबू और सड़न: इस रोग के लगने पर कंद के अंदर का हिस्सा सड़ जाता है और उसमें से बदबू आती है.
फसल की वृद्धि रुकना: उखड़ा रोग इतना खतरनाक होता है कि इसके लगने पर संक्रमित पौधे बौने रह जाते हैं और उनकी वृद्धि रुक जाती है.
फसल चक्र अपनाएं: उखड़ा रोग बचाव के लिए किसान एक ही खेत में बार-बार प्याज न लगाएं, 3-4 साल के अंतराल पर फसल बदलें.
बीज उपचार जरूर करें: बुवाई से पहले बीजों को कार्बेंडाजिम (2-3 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित जरूर करें.
जल निकासी का दें ध्यान: उखड़ा रोग बचाव के लिए खेत में पानी जमा न होने दें, और ऊंची क्यारियां बनाएं, जिससे इस महीने होने वाली बेमौसम बारिश का पीन आसानी से निकल जाए.
रासायनिक उपचार करें: यदि उखड़ारोग का प्रकोप दिखे तो कार्बेंडाजिम (12%) + मैनकोज़ेब (63%) WP (2.5 ग्राम/लीटर) या एज़ोक्सीस्ट्रोबिन + टेबुकोनाज़ोल (2 मिली/लीटर) का ड्रेंचिंग कर जड़ों में पानी दें.
उचित प्रबंधन करें: संक्रमित पौधों को खेत से हटाकर नष्ट कर दें और नाइट्रोजन युक्त खाद का कम उपयोग करें.
कंद का उपचार करते रहें: कटाई के बाद प्याज को 2-3 दिन छाया में सुखाएं ताकि गर्दन अच्छी तरह सूख जाए और कंद सड़े नहीं.
फरवरी महीने में रोपे हुए प्याज की समय-समय पर निकाई और सिंचाई करते रहें और प्याज में थ्रिप्स के नियंत्रण के लिए प्रति हेक्टेयर 20 पीला चिपकने वाले फंदो का इस्तेमाल करें. जरूरत पड़ने पर इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस० एल० का 1 एम० एल० प्रति 3 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें.