
खेती में लागत बढ़ने और जोत का आकार सीमित होने के बीच किसान अगर एक ही खेत से अलग-अलग समय पर कई प्रोडक्ट हासिल कर पाएं तो उनकी आमदनी के रास्ते बढ़ सकते हैं. ऐसा ही एक मॉडल गन्ने के साथ सरसों की अंतरफसली खेती और मधुमक्खी पालन को जोड़कर तैयार किया जा सकता है. इसमें मुख्य फसल गन्ना रहती है, खाली जगह में सरसों लगाई जाती है और सरसों में फूल आने पर खेत के आसपास मधुमक्खियों के बॉक्स रखे जाते हैं. इस तरह किसान को गन्ने के अलावा सरसों और शहद से भी आमदनी हासिल करने का मौका मिलता है.
गन्ने में अंतरफसल की खेती कोई नई नहीं है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से जुड़े भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के मुताबिक गन्ना लंबे समय तक खेत में रहता है और इसकी कतारों के बीच मौजूद खाली जगह में उपयुक्त अंतरफसल लेकर जमीन की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है. संस्थान के प्रदर्शन में शरदकालीन गन्ने के साथ सरसों की अंतरफसल को भी शामिल किया गया है.
इस मॉडल को समझना काफी आसान है. शरदकाल में गन्ना लगाने के बाद शुरुआती महीनों में पौधे छोटे रहते हैं. चौड़ी कतारों वाली रोपाई में दो कतारों के बीच पर्याप्त जगह और सूर्य की रोशनी उपलब्ध रहती है. इसी स्थान का इस्तेमाल कम अवधि वाली सरसों की फसल के लिए किया जा सकता है.
गन्ना लंबे समय तक खेत में रहने वाली फसल है, जबकि सरसों कुछ जल्दी तैयार हो जाती है. लिहाजा सरसों की कटाई के बाद गन्ने को बढ़ने के लिए पूरा स्थान मिल जाता है. गन्ने में उपलब्ध बीच के स्पेस के इस्तेमाल से अतिरिक्त उत्पादन लेने की संभावना को भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान भी डिटेल में बताया है. पुराना भारतीय कृषि अनुसंधान यह भी दिखाता है कि शरदकालीन गन्ने के साथ भारतीय सरसों की अंतरफसल पर बाकायदा प्रयोग किए गए हैं.
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसान को गन्ने के तैयार होने तक सिर्फ उसी फसल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. बीच में सरसों तैयार होने पर बीज बेचकर पहले आमदनी ली जा सकती है. साथ ही अंतरफसल खेत की खाली जगह का उपयोग करती है. भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के मुताबिक गन्ने की कतारों के बीच खाली जगह खरपतवारों के बढ़ने का अवसर देती है, जबकि उपयुक्त अंतरफसल इस जगह का बेहतर इस्तेमाल करने के साथ खरपतवार को दबाने में भी मदद कर सकती है.
इस मॉडल की तीसरी कड़ी मधुमक्खी पालन है. सरसों में फूल आने के दौरान खेत के पास मधुमक्खियों के बॉक्स रखे जा सकते हैं. मधुमक्खियों को फूलों से पराग और मकरंद मिलता है और बदले में उनकी गतिविधियां सरसों के परागण में मदद करती हैं.
भारतीय कृषि अनुसंधान के एक अध्ययन में मधुमक्खियों द्वारा परागण को फसल की उपज और क्वालिटी सुधारने का प्रभावी तरीका बताया गया है. सरसों में मधुमक्खियों की गतिविधियों और परागण को लेकर भी शोध किया गया है.
मधुमक्खियों की मौजूदगी का असर केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं है. राजस्थान के कोटा में हुए एक अध्ययन में सरसों के खेत में मधुमक्खी (Apis mellifera) के इस्तेमाल का परीक्षण किया गया. अध्ययन में खुले परागण वाले पौधों में प्रति पौधा फलियों की संख्या, प्रति फली बीज और बीज उत्पादन के बेहतर परिणाम मिले और शोधकर्ताओं ने मधुमक्खियों की भूमिका को सरसों उत्पादन और शहद उत्पादन दोनों से जोड़ा.
इसी तरह भारतीय सरसों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में परागणकर्ताओं को पूरी तरह बाहर रखने वाले प्लॉट की तुलना में Apis mellifera वाले प्लॉट में बीज उपज 19.66 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई, जबकि खुले परागण में यह बढ़ोतरी 35.50 प्रतिशत थी. ये रिजल्ट स्थान, किस्म, मौसम और मधुमक्खियों की उपलब्धता के अनुसार बदल सकते हैं, इसलिए इन आंकड़ों को हर खेत के लिए निश्चित बढ़ोतरी नहीं माना जाना चाहिए.
इस व्यवस्था को सही तरीके से अपनाया जाए तो किसान के सामने आय के तीन स्रोत बन सकते हैं. पहली और मुख्य कमाई गन्ने की बिक्री से होगी. दूसरी आय सरसों के बीज या उससे तैयार तेल के रूप में हो सकती है. तीसरा स्रोत मधुमक्खी पालन से मिलने वाला शहद और दूसरे मधुमक्खी उत्पाद हो सकते हैं.
इसके अलावा मधुमक्खियां सरसों में बतौर परागणकर्ता काम करती हैं. यानी तीसरा व्यवसाय दूसरे व्यवसाय की उत्पादकता को भी सहयोग दे सकता है. भारतीय सरसों पर हुए शोध में मधुमक्खी परागण और खुले परागण की स्थिति में फलियों, बीजों और उपज से जुड़े कई मानकों में परागणकर्ताओं को बाहर रखे जाने की तुलना में बेहतर नतीजे पाए गए हैं.
गन्ने की शुरुआती अवस्था में खेत की खाली जमीन पर खरपतवार तेजी से बढ़ सकते हैं. इससे पोषक तत्व, पानी और रोशनी के लिए आपसी मुकालबा होता है. भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान का कहना है कि अंतर-पंक्ति स्थान (फसल की कतारों के बीच का स्थान) में अंतरफसल अतिरिक्त उत्पादन देने के साथ खरपतवार को दबाने में भी भूमिका निभा सकती है.
इस लिहाज से सरसों केवल अतिरिक्त कमाई वाली फसल नहीं रहती, बल्कि खेत में उपलब्ध जगह और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल का साधन भी बन जाती है.
इस मॉडल में गन्ने की रोपाई ऐसी पद्धति से करनी होगी जिसमें सरसों के लिए पर्याप्त स्थान मौजूद रहे. इस मॉडल में 120 से 150 सेंटीमीटर की चौड़ी कतार की व्यवस्था के बीच एक या दो पंक्तियां सरसों की लगाने की सिफारिश की जाती है. हालांकि गन्ने की सही दूरी, सरसों की किस्म, पौध संख्या और खाद की मात्रा स्थानीय मिट्टी, गन्ने की किस्म, सिंचाई की व्यवस्था और कृषि-जलवायु क्षेत्र के अनुसार तय की जानी चाहिए.
दो फसलें साथ होने से पोषक तत्व प्रबंधन भी महत्वपूर्ण हो जाता है. किसान को यह ध्यान रखना होगा कि अंतरफसल के कारण मुख्य गन्ने के पोषण, पानी और बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े. इसलिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश के अनुसार खाद और उर्वरक प्रबंधन करना ज्यादा सुरक्षित होगा.
सरसों में फूल आने पर मधुमक्खियां सक्रिय रहती हैं. इसलिए इसी अवधि में मधुमक्खियों के लिए हानिकारक कीटनाशकों का गैर-जरूरी इस्तेमाल इस पूरे मॉडल को नुकसान पहुंचा सकता है. खेत में मधुमक्खी बॉक्स रखने से पहले मधुमक्खी पालक और किसान के बीच स्प्रे को लेकर आपसी तालमेल बहुत जरूरी है.
इस व्यवस्था की खासियत यह है कि इसमें किसान नई जमीन लिए बिना मौजूदा खेत को अलग-अलग स्तर पर इस्तेमाल करता है. गन्ना मुख्य और लंबी अवधि की फसल बना रहता है, सरसों शुरुआती महीनों की खाली जगह का इस्तेमाल करती है और सरसों के फूल मधुमक्खी पालन को आधार देते हैं. शोध भी गन्ने में अंतरफसल की उपयोगिता और सरसों में मधुमक्खियों की परागण भूमिका, दोनों के बारे में बताता है.
इस तरह गन्ना + सरसों + मधुमक्खी पालन मॉडल जमीन बढ़ाए बिना किसान के लिए उत्पादन और आय के स्रोतों में विविधता लाने का विकल्प बन सकता है. हालांकि वास्तविक मुनाफा स्थानीय उपज, बाजार भाव, श्रम लागत, सिंचाई, मधुमक्खी कॉलोनी के प्रबंधन और कृषि लागत पर निर्भर करेगा.