
देश में सोयाबीन किसानों की आय का एक प्रमुख स्रोत है और खासतौर पर मध्य प्रदेश को ‘सोया स्टेट’ के रूप में जाना जाता है. यहां देश के कुल सोयाबीन क्षेत्रफल का लगभग 55 प्रतिशत और उत्पादन का करीब 64 प्रतिशत हिस्सा आता है. इसके बावजूद किसानों को एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ रहा है—पौधों में अच्छी वृद्धि और फूल आने के बाद भी पर्याप्त फलियां नहीं बन पाती हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या कई कारणों से पैदा होती है, जिनमें पोषण असंतुलन, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, नमी की समस्या, कीट-रोग प्रकोप और प्रतिकूल मौसम प्रमुख हैं. कई बार पौधों में बहुत अधिक नाइट्रोजन देने से पत्तियों और शाखाओं की बढ़ोतरी ज्यादा हो जाती है, जिससे फूल और फलियां बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है.
ICAR के कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि फसल में अधिक पत्तियां दिख रही हों और फलियां नहीं बन रही हों, तो फूल आने की अवस्था पर सीसीसी (250 पीपीएम) और एनएए (20-40 पीपीएम) का छिड़काव करना फायदेमंद होता है. इससे फूल गिरने की समस्या कम होती है और फलियों की संख्या बढ़ती है.
सोयाबीन में फूल और फल बनने का समय बेहद संवेदनशील होता है. सूखा पड़ने पर फूल झड़ जाते हैं, वहीं पानी भर जाने पर जड़ों को नुकसान पहुंचता है. इसलिए इस समय जरूरत के अनुसार सिंचाई करना और खेत से पानी निकास की सही व्यवस्था रखना जरूरी है.
फसल को हेलिकोवर्पा और स्पोडोप्टेरा जैसे कीट नुकसान पहुंचाते हैं, जो फूलों और कोमल भागों को खा जाते हैं. वहीं कॉलर रॉट और जड़गांठ जैसे रोग पौधों को कमजोर बना देते हैं. किसान नियमित रूप से फसल की निगरानी करें और समय रहते नियंत्रण उपाय अपनाएं.
यदि सोयाबीन की बुआई समय पर नहीं की जाती, तो फूल आने का समय खराब मौसम में पड़ सकता है, जिससे फलियां नहीं बनतीं. इसलिए क्षेत्र के अनुसार अनुशंसित किस्मों का चयन और समय पर बुआई करना बेहद जरूरी है.
गर्मी, सूखा या पोषण की कमी जैसी स्थितियों में पौधे तनाव में आ जाते हैं, जिससे फलन प्रभावित होता है. ऐसी स्थिति में सलिसिलिक एसिड (50 पीपीएम) या थायो यूरिया (500 पीपीएम) का छिड़काव मददगार साबित होता है. इसके साथ ही जिंक, आयरन, मैग्नीशियम और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का 0.5 प्रतिशत घोल भी उपयोगी है.
विशेषज्ञों का मानना है कि बोरॉन, मॉलिब्डेनम, पोटाश और कैल्शियम जैसे पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग करने से फूलों का फलियों में परिवर्तन बेहतर होता है. सही प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान इस समस्या से निपट सकते हैं. कुल मिलाकर, सोयाबीन में फलियां न बनना एक गंभीर समस्या जरूर है, लेकिन समय पर सही कदम उठाकर किसान अपनी पैदावार और आय दोनों को बढ़ा सकते हैं.