
आम को 'फलों का राजा' कहा जाता है, लेकिन आज इस राजा के सिंहासन पर जलवायु परिवर्तन का खतरा मंडरा रहा है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह (विभागाध्यक्ष, प्लांट पैथोलॉजी) के अनुसार, आम के बागों का हालिया निरीक्षण यह बताता है कि पेड़ अब केवल फल देने वाली मशीन नहीं रहे, बल्कि वे बदलते पर्यावरण के साथ संघर्ष कर रहे हैं.
उनके अनुसार, इस वर्ष आम के मंजर (फूल) आने में जो 7 से 10 दिनों की देरी हुई है, वह सीधे तौर पर फरवरी के कम तापमान और असामान्य शीतकाल का नतीजा है. प्रोफेसर सिंह चेतावनी देते हैं कि यदि हमने समय रहते "क्लाइमेट स्मार्ट" तकनीकों को नहीं अपनाया, तो आने वाले समय में आम की मिठास और पैदावार दोनों कम हो सकती है.
प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह का मानना है कि वैज्ञानिक प्रबंधन ही वह एकमात्र रास्ता है जिससे किसान इस चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं. उनके शोध बताते हैं कि 15 वर्ष से पुराने पेड़ों पर मौसम की मार सबसे अधिक पड़ती है, जबकि युवा पेड़ अधिक लचीले होते हैं. डॉ. सिंह विशेष रूप से 'मिली बग' जैसे कीटों के प्रति सचेत रहने की सलाह देते हैं, जो मंजर का रस चूसकर फसल को बर्बाद कर देते हैं. एस.के. सिंह ने किसानों को सुझाव देते हुए बताया कि आम को स्वस्थ रखने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए.
इस समय आम के बागों में दो स्थितियां दिखाई दे रही हैं. जहां सही देखभाल हुई है, वहां छोटे-छोटे फल यानी 'टिकोले' बन चुके हैं. लेकिन जहां लापरवाही हुई, वहां 'मिली बग' नाम के सफेद कीड़े का हमला तेज हो गया है. यह कीड़ा मंजर और टिकोले का रस चूस लेता है, जिससे फल समय से पहले ही गिर जाते हैं. इसके अलावा, यह एक चिपचिपा पदार्थ छोड़ता है जिस पर काली फफूंद (सूटी मोल्ड) जम जाती है. इससे पत्तों को धूप नहीं मिल पाती और पेड़ कमजोर हो जाता है. समय रहते इसका इलाज न किया गया तो उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है.
इस साल आम के शौकीनों और किसानों ने महसूस किया होगा कि पेड़ों पर बौर (मंजर) देरी से आए. इसका मुख्य कारण फरवरी महीने के अंत तक रात का तापमान 10°C से नीचे रहना है. आम के अच्छे पुष्पन के लिए रात का तापमान 12–15°C और दिन का तापमान 25–30°C होना चाहिए. इस साल सर्दी न केवल देर से आई, बल्कि देर तक टिकी भी रही. तापमान के इस उतार-चढ़ाव ने पेड़ों के प्राकृतिक चक्र को प्रभावित किया है. देर से आए मंजर अधिक कोमल होते हैं और उन पर बीमारी लगने का खतरा भी ज्यादा रहता है.
वैज्ञानिक अध्ययन में एक रोचक बात सामने आई है कि पेड़ों की उम्र का मौसम के साथ गहरा संबंध है. 15 साल से छोटे पेड़ मौसम के बदलाव को बेहतर तरीके से झेल लेते हैं और उनमें मंजर जल्दी आते हैं. इसके विपरीत, जो पेड़ 15 साल से ज्यादा पुराने या बहुत बड़े हो चुके हैं, वे तापमान के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं. उनमें बौर आने में देरी देखी गई है. इसका मतलब यह है कि किसानों को अब अपने पुराने बागों के लिए अलग और अधिक उन्नत प्रबंधन रणनीतियां अपनानी होंगी.
जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ किताबी बात नहीं रही. डॉ. सिंह के अनुसार, आने वाले 10-15 वर्षों में तापमान में 1 से 1.5 डिग्री की और बढ़ोत्तरी हो सकती है. इसका सीधा असर आम के परागण (Pollination) पर पड़ता है. जब तापमान अचानक बढ़ता है, तो परागण करने वाले कीट कम हो जाते हैं और फल झड़ने की समस्या बढ़ जाती है. इससे निपटने के लिए अब हमें ऐसी किस्मों पर ध्यान देना होगा जो गर्मी झेल सकें और जिनमें फूल आने का समय मौसम के अनुकूल हो.
अच्छी पैदावार के लिए "क्लाइमेट स्मार्ट" खेती जरूरी है. सबसे पहले मिली बग को रोकने के लिए पेड़ों के तनों पर प्लास्टिक की पट्टी बांधनी चाहिए ताकि कीड़े ऊपर न चढ़ सकें. संतुलित खाद (NPK) के साथ-साथ बोरॉन और जिंक का छिड़काव फल को मजबूती देता है. सिंचाई के लिए 'ड्रिप सिस्टम' और नमी बनाए रखने के लिए 'मल्चिंग' (मिट्टी को ढकना) बेहतरीन उपाय हैं. साथ ही, अब किसानों को 'डिजिटल फार्मिंग' और मौसम की जानकारी देने वाले ऐप्स का सहारा लेना चाहिए ताकि वे पहले से जान सकें कि कब बारिश होगी या कब लू चलेगी.
क्या करें (Do’s):
नियमित निरीक्षण: हर सुबह बाग में जाकर मंजर और टिकोलों की जांच करें.
संतुलित पोषण: केवल यूरिया न डालें, पोटाश और सूक्ष्म तत्वों का भी प्रयोग करें.
वैज्ञानिक सलाह: किसी भी कीटनाशक के प्रयोग से पहले कृषि विशेषज्ञों से पूछें.
साफ-सफाई: बाग में हवा और धूप के संचार के लिए सूखी टहनियों की छंटाई करें.
क्या न करें (Don’ts):
मंजर अवस्था में लापरवाही: जब फूल खिले हों, तब तेज रसायन वाले छिड़काव से बचें क्योंकि इससे मित्र कीट मर जाते हैं.
अत्यधिक सिंचाई: फल बनने के समय बहुत ज्यादा पानी देने से भी फल गिर सकते हैं, इसे संतुलित रखें.
घने बाग: पेड़ों के बीच पर्याप्त दूरी रखें ताकि बीमारी न फैले.
आम की बागवानी अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि विज्ञान है. प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह का यह संदेश स्पष्ट है, यदि हम प्रकृति के संकेतों को समझेंगे और आधुनिक तकनीकों को अपनाएंगे, तभी हम आने वाली पीढ़ियों के लिए आम की मिठास बचा पाएंगे. सजग किसान ही समृद्ध किसान है.