
बिहार और झारखंड में धान और गेहूं के बाद सबसे ज्यादा मक्का की खेती होती है. बहुत से किसान मक्का की खेती पर अपना जीवन चलाते हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों में मक्का के किसानों के सामने एक बड़ी समस्या आ गई है. इसे सैनिक आर्मी कीट या फॉल आर्मी वर्म कहते हैं. यह कीट मक्का की फसल को बहुत नुकसान पहुंचता है. कुछ जगहों पर इस कीट की वजह से मक्का की फसल का 80 से 85 प्रतिशत तक नाश हो जाता है.
किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे इस कीट को समय पर पहचान नहीं पाते. जब फसल में कीट दिखाई देता है, तब तक बहुत नुकसान हो चुका होता है. अगर समय रहते पहचान लिया जाए तो इसे रोकना आसान हो सकता है.
वैज्ञानिकों के अनुसार, सैनिक आर्मी कीट अपने जीवन-चक्र को चार चरणों में पूरा करता है. इनमें सबसे खतरनाक चरण इसकी लार्वा (बालक) अवस्था होती है. लार्वा पौधे के कोमल पत्तों को खाता है और बाद में भुट्टे में बनने वाले दानों को भी नुकसान पहुँचाता है. इसी वजह से मक्का का उत्पादन बहुत घट जाता है.
सैनिक आर्मी कीट को पहचानना आसान है. इसके शरीर पर चार सफेद धारियां होती हैं. इसके माथे पर उल्टा “Y” अक्षर जैसा निशान होता है. इसके आठवें हिस्से पर चार काले बिंदु दिखते हैं. अगर खेत में मक्का के पत्तों पर छोटे-छोटे छिद्र दिखाई दें, तो समझ जाइए कि कीट ने पत्तों को नुकसान पहुँचाया है.
किसानों को कुछ आसान कदम उठाने चाहिए ताकि फसल को कीट से बचाया जा सके. सबसे पहला उपाय है, बीज बोने से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करना. इससे मिट्टी में छिपे कीट बाहर निकलते हैं और सूरज की रोशनी या पक्षी उन्हें खा जाते हैं.
दूसरा उपाय है, प्रतिरोधक यानी रेसिस्टेंस बीजों का चयन करना. ऐसे बीज की फसल कीट के प्रति मजबूत रहती है और कम नुकसान होता है.
तीसरा और अंतिम उपाय है रासायनिक नियंत्रण. किसान क्लोरेंट्रानिलिप्रोले, बायार, फेम या फ्लूबेंडामाइड जैसी दवाइयों का छिड़काव कर सकते हैं. इसे 0.3 मिलीलीटर दवा को 1 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कना चाहिए. सही समय और सही मात्रा में छिड़काव करने से मक्का की फसल सुरक्षित रहती है.
मक्का की फसल किसान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. सैनिक आर्मी कीट बहुत नुकसान कर सकता है, लेकिन अगर किसान समय रहते पहचान करें और बचाव के उपाय अपनाएं, तो फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है. खेत की जुताई, मजबूत बीज और दवा का सही इस्तेमाल करने से मक्का की फसल अच्छी और सुरक्षित रहती है.
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