धान में तना छेदक-माहू का बढ़ा खतरा! किसानों को बताया जैविक से लेकर रासायनिक नियंत्रण का तरीका, जानें कब करें छिड़काव

धान में तना छेदक-माहू का बढ़ा खतरा! किसानों को बताया जैविक से लेकर रासायनिक नियंत्रण का तरीका, जानें कब करें छिड़काव

बालाघाट के कारंजा में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत किसानों को धान में तना छेदक, माहू और शीथ ब्लाइट की पहचान व नियंत्रण की जानकारी दी गई. किसानों को जीवामृत, नीमास्त्र और ब्रह्मास्त्र के उपयोग के साथ जैविक एवं अनुशंसित रासायनिक उपाय बताए गए.

धर्मेंद्र सिंह
  • Balaghat ,
  • Sep 25, 2026,
  • Updated Sep 25, 2026, 9:00 AM IST

धान की फसल में कीट एवं रोगों का समय पर नियंत्रण नहीं होने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है.ऐसे में किसानों को फसल की नियमित निगरानी, कीटों की शुरुआती पहचान और आवश्यकता के अनुसार जैविक एवं अनुशंसित रासायनिक उपाय अपनाने के लिए जागरूक किया जा रहा है.इसी क्रम में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के विकासखंड लांजी के ग्राम कारंजा में किसानों के लिए जागरूकता अभियान आयोजित किया गया.

कृषि विभाग आत्मा समिति के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम में किसानों को प्राकृतिक एवं पर्यावरण हितैषी खेती के महत्व की जानकारी दी गई.इसके साथ ही धान में लगने वाले प्रमुख कीट तना छेदक और माहू की पहचान, उनकी रोकथाम तथा अधिक प्रकोप की स्थिति में नियंत्रण के उपायों के बारे में विस्तार से समझाया गया.

जीवामृत, नीमास्त्र और ब्रह्मास्त्र बनाने की जानकारी

अजय बिजेवार ने किसानों को प्राकृतिक खेती में उपयोग होने वाले जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और ब्रह्मास्त्र के बारे में जानकारी दी. उन्होंने इनके तैयार करने की विधि और फसलों में उपयोग के तरीके समझाए.

किसानों को बताया गया कि प्राकृतिक खेती में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से तैयार किए जाने वाले जैविक उत्पादों का उपयोग फसल प्रबंधन में किया जा सकता है. धान में माहू और तना छेदक जैसे कीटों की रोकथाम के लिए ब्रह्मास्त्र एवं नीमास्त्र का 3 से 5 लीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने की जानकारी दी गई.

साथ ही किसानों को सलाह दी गई कि किसी भी कीट का प्रकोप दिखाई देने पर तुरंत पहचान करें और फसल की स्थिति के अनुसार नियंत्रण उपाय अपनाएं. नियमित खेत निरीक्षण को कीट प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया.

सीधी बुवाई वाले धान खेत का भी निरीक्षण

जागरूकता अभियान के दौरान कृषक हेमेंद्र उमरे के खेत में पहुंचकर सीधी बुवाई वाली धान की फसल का निरीक्षण किया गया. निरीक्षण के दौरान फसल की स्थिति और कीट प्रकोप का जायजा लिया गया.

इस खेत में तना छेदक और माहू का प्रकोप अपेक्षाकृत कम पाया गया. किसानों को बताया गया कि फसल की नियमित निगरानी करने से शुरुआती स्तर पर ही कीटों की पहचान की जा सकती है और समय रहते नुकसान को कम किया जा सकता है.

ऐसे पहचानें तना छेदक का प्रकोप

किसानों को धान में तना छेदक के प्रकोप की पहचान के लक्षण भी बताए गए.जानकारी के अनुसार इसका प्रकोप धान की फसल में सामान्यतः दो प्रमुख अवस्थाओं में देखा जा सकता है—पहली अवस्था रोपाई के करीब 20-25 दिन बाद और दूसरी अवस्था लगभग 60-65 दिन बाद.

अधिक प्रकोप होने पर धान की प्रभावित बालियां सफेद और पोची दिखाई देने लगती हैं.ऐसी बालियों को बाहर की ओर खींचने पर वे आसानी से निकल आती हैं. इसके अलावा तने की निचली सतह पर तना छेदक की इल्ली द्वारा छोड़ा गया मल भी दिखाई दे सकता है.

किसानों को सलाह दी गई कि ऐसे लक्षण दिखाई देने पर फसल का निरीक्षण बढ़ाएं और आवश्यकता के अनुसार नियंत्रण उपाय अपनाएं.

ज्यादा प्रकोप पर रासायनिक नियंत्रण की जानकारी.

कार्यक्रम में किसानों को यह भी बताया गया कि यदि तना छेदक का प्रकोप अधिक हो तो कृषि विभाग की अनुशंसाओं के अनुसार उपलब्ध विकल्पों में से उचित विकल्प का उपयोग किया जा सकता है. इनमें कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड 50 प्रतिशत एसपी 250 ग्राम प्रति एकड़, क्लोरपायरीफॉस 50 प्रतिशत ईसी 400 मिली, प्रोफेनोफॉस 50 प्रतिशत ईसी 400 मिली अथवा इमामेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिशत एसजी 100 ग्राम प्रति एकड़ की जानकारी दी गई.

वहीं धान में माहू के नियंत्रण के लिए पाइमेट्रोजिन 50 प्रतिशत डब्ल्यूजी 100-120 ग्राम, डायनोटेफ्यूरान 20 प्रतिशत एसजी 100 ग्राम अथवा ट्राइफ्लूमेजोपाइरिम 10.6 प्रतिशत एससी 96 मिली प्रति एकड़ के अनुशंसित विकल्पों की जानकारी किसानों को दी गई.

शीथ ब्लाइट से बचाव की भी दी जानकारी

कार्यक्रम में धान की फसल में होने वाले शीथ ब्लाइट रोग की पहचान और रोकथाम के उपाय भी समझाए गए. रोग की स्थिति में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी 500 ग्राम तथा स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 6 ग्राम प्रति एकड़ के उपयोग की जानकारी दी गई.

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से फसल में किसी भी कीट या रोग के लक्षण दिखाई देने पर बिना पहचान के दवा का उपयोग न करने और स्थानीय कृषि विभाग की सलाह के अनुसार ही अनुशंसित उपाय अपनाने पर जोर दिया.

 

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