
देशभर में तेजी से फैल रही गाजर घास (पार्थेनियम) अब किसानों और आम लोगों के लिए गंभीर समस्या बन चुकी है. फसलों को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ यह घास त्वचा रोग और एलर्जी जैसी बीमारियों का कारण भी बन रही है. लेकिन अब इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने एक प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल समाधान खोज लिया है.
गाजर घास, जिसे पार्थेनियम, चटक चांदनी और कांग्रेस घास के नाम से भी जाना जाता है, भारत में 1950 के दशक में अमेरिका से आए लाल गेहूं के साथ पहुंची थी. 1955 में इसे पहली बार महाराष्ट्र के पुणे में देखा गया था. आज यह खरपतवार देश के लगभग हर हिस्से में फैल चुकी है. इसकी जड़ों से निकलने वाला विषैला पदार्थ अन्य फसलों को बढ़ने नहीं देता, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. इसके संपर्क में आने से त्वचा रोग, एलर्जी और श्वसन संबंधी समस्याएं भी होती हैं.
खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर के वैज्ञानिकों ने गाजर घास के नियंत्रण के लिए एक विशेष कीट की खोज की है, जिसे मैक्सिकन बीटल कहा जाता है. संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पी के सिंह के अनुसार, यह कीट केवल गाजर घास को ही खाता है और किसी अन्य फसल, पौधे, पशु या इंसान को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता.
मैक्सिकन बीटल एक बायोलॉजिकल कंट्रोल तकनीक का हिस्सा है...
गाजर घास का जीवन चक्र लगभग 3 महीने का होता है. एक पौधा 5,000 से 30,000 तक नए पौधे पैदा कर सकता है. वहीं, मैक्सिकन बीटल एक बार में लाखों अंडे देता है ये कीट गाजर घास को खाकर तेजी से उसका सफाया कर देते हैं. 2–3 महीने में प्रभाव साफ दिखाई देने लगता है.
किसान सीधे खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर से संपर्क कर सकते हैं. यह कीट किसानों को निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है. डाक के माध्यम से भी भेजा जाता है. विशेष डिब्बों में पैक किया जाता है, जिसमें हवा का प्रबंध होता है. कॉरपोरेट सेक्टर के लिए यह कीट 5 रुपये प्रति कीट की दर से उपलब्ध है.
संस्थान द्वारा हर साल अगस्त से सितंबर के बीच राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जाता है, जिसमें गाजर घास के उन्मूलन और इसके दुष्प्रभावों के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है.