
देश में हर किसान यही चाहत है कि खेती-किसानी से उसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफ हो सके. इसी चाहत का नतीजा है कि उत्तर प्रदेश में ढैंचा हरी खाद की खेती करने वाले किसानों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है. दरअसल, खेती-बाड़ी में रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से खेतों की उपजाऊ क्षमता तेजी से घट रही है, जो किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है. इसी कारण अब ज्यादातर किसान ढैंचा की खेती कर रहे हैं. प्रदेश के कुशीनगर, गोरखपुर, कानपुर, गोंडा, देवरिया, बस्ती समेत कई जिलों में किसानों की पहली पसंद ढैंचा हरी खाद बनती जा रही है.
वाराणसी के विकास खण्ड आराजी लाइन के ग्राम रखौना के किसान अलियार शर्मा ने बताया कि कृषि विभाग के सामान्य बिक्री के अंतर्गत 50 प्रतिशत अनुदान पर ढ़ैचे बीज प्राप्त कर दो हैक्टेयर में बुवाई किया गया है. उन्होंने बताया कि ढैंचा की जड़ों में प्रचुर मात्रा में विकसित राइजोबियम जीवाणु भूमि में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने का कार्य करते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है. वहीं, हरी खाद के रूप में ढैंचा का उपयोग किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रहा है.
अलियार शर्मा ने आगे बताया कि इससे न केवल भूमि की गुणवत्ता में सुधार होता है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम होती है. ढैंचा की जुताई के बाद यह मिट्टी में मिलकर जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाता है, जिससे फसल उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है तथा मृदा स्वास्थ्य लंबे समय तक बेहतर बना रहता है.
उधर,गोंडा जिले की महिला किसान सुचिता ने बताया कि खेत में ढैंचा के सड़ने से मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा तेजी से बढ़ती है, जिससे मिट्टी की सेहत में बड़ा सुधार होता है. इस हरी खाद से जमीन को प्राकृतिक रूप से भरपूर नाइट्रोजन मिलता है, जो आने वाली फसल की ग्रोथ को बहुत अच्छा बनाता है. खेत को अंदर से ही पूरा पोषण मिलने के कारण बाजार की महंगी रासायनिक खादों, जैसे यूरिया और डीएपी की जरूरत बहुत कम पड़ती है, जिससे खेती की लागत में भारी कमी आती है.
उन्होंने बताया कि इस खाद की वजह से मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ जाती है और खेत में लंबे समय तक नमी बनी रहती है. ढैंचा की घनी फसल होने का एक फायदा यह भी है कि इससे खेत में फालतू घास और खरपतवार उगने की समस्या अपने आप काफी कम हो जाती है.
इसी क्रम में देवरिया के विकास खण्ड रामपुर कारखाना के ग्राम पिपराइच के प्रगतिशील किसान संजय पांडेय जी और अन्य किसानों द्वारा 50% अनुदान पर प्राप्त ढैंचा बीज को बोया गया है. उन्होंने बताया कि ढैंचा हरी खाद के रूप में काफी लाभकारी है. इससे खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और किसानों का रासायनिक खाद का खर्च बचता है. वहीं, जनपद बस्ती के विकास खण्ड गौर के घनघटा ग्राम के किसान ब्रह्मदेव शुक्ला सामान्य बीज वितरण के तहत अनुदान पर ढैंचा बीज लेकर खेती कर रहे हैं.
आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, अयोध्या के वैज्ञानिक डॉ जसवंत सिंह के अनुसार, ढैंचा की बुवाई धान की रोपाई से लगभग 40 से 50 दिन पहले, यानी मई या जून के महीने में की जाती है. जब यह फसल करीब 40-45 दिन की हो जाती है, तब इसमें फूल आने से ठीक पहले इसे ट्रैक्टर के जरिए खेत में ही जोतकर पानी भर दिया जाता है, जिससे यह मिट्टी के अंदर ही सड़कर बेहतरीन जैविक खाद में बदल जाती है.
वहीं, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, अयोध्या के वैज्ञानिक डॉ जसवंत सिंह ने बताया कि भूमि की उर्वरता बढ़ाने एवं टिकाऊ कृषि को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ढैंचा (हरी खाद) की खेती किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रही है. उन्होंने बताया कि ढैंचा एक उत्कृष्ट हरी खाद फसल है, जो मिट्टी में जैविक पदार्थ एवं नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर भूमि की उर्वर शक्ति को सुदृढ़ करती है. इसकी जड़ों में पाए जाने वाले राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर मिट्टी को प्राकृतिक रूप से पोषक तत्व प्रदान करते हैं.
1- मिट्टी की उर्वरता एवं जैविक कार्बन में वृद्धि होती है.
2- रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है.
3- भूमि की जलधारण क्षमता एवं संरचना में सुधार होता है.
4- खरपतवार नियंत्रण में सहायता मिलती है.
5- सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है.
6- आगामी फसलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है.
7- पर्यावरण अनुकूल एवं लागत प्रभावी कृषि को बढ़ावा मिलता है.
डॉ जसवंत सिंह ने आगे बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा किसानों को हरी खाद के महत्व से बताते हुए प्राकृतिक एवं सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिससे भूमि की सेहत सुरक्षित रहे और कृषि उत्पादन में निरंतर वृद्धि हो सके.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार किसानों को राहत देने और हरी खाद को बढ़ावा देने के लिए बड़ी पहल की है. प्रदेश के कृषि निदेशक डॉ पंकज कुमार त्रिपाठी ने बताया कि कृषि विभाग 45,000 क्विंटल ढैंचा बीज वितरित किया गया है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 4 लाख मिनीकिट 50% सब्सिडी पर बांटे जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए 'ढैंचा' जैसे हरी खाद वाले बीजों को प्राथमिकता दी जा रही है. इससे न केवल मिट्टी को नाइट्रोजन मिलता है, बल्कि आने वाली मुख्य फसल की पैदावार भी बेहतर होती है.
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