
गन्ने की फसल पर इन दिनों 'प्लास्सी बोरर' जैसे खतरनाक कीट दिखाई दे रहा है, जो किसानों के लिए बेहद फिक्र की बात है. यह आफत वाला कीट इस समय पश्चिम उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में और बिहार के पश्चिमी चंपारण जैसे मुख्य गन्ने के बेल्ट में देखा जा रहा है. इस खतरनाक कीट का हमला अप्रैल से लेकर अक्टूबर तक लगातार जारी रहता है और अब कुछ जगहों पर इसका प्रकोप साफ देखा जा रहा है, जिससे किसानों की सालभर की मेहनत पर पानी फिरने का पूरा खतरा पैदा हो गया है. यह आफत वाला कीट गन्ने के अंदर चुपके से घुसकर उसके अंदर के हिस्से को बिल्कुल खोखला कर देता है.
इस नाजुक और गंभीर हालात को देखते हुए किसानों को वक्त रहते होशियार और सतर्क रहने की बहुत जरूरत है, ताकि फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सके. इस खतरनाक कीट की पहचान और इसके नुकसान पहुंचाने के तौर-तरीकों को ठीक से समझना हर गन्ना किसान के लिए बेहद लाजिमी है, वरना जरा सी लापरवाही गन्ने की फसल को भारी नुकसान पहुंचा सकती है.
शुरुआत में इस कीट की छोटी सुंडियां झुंड बनाकर गन्ने की पत्तियों को खुरचकर खाती हैं और फिर गन्ने के पोर के अंदर घुस जाती हैं. इसके बाद दर्जनों सुंडियां मिलकर गन्ने के अंदर के हिस्से को पूरी तरह चाट जाती हैं और वहां काले रंग का गंदा कचरा जमा कर देती हैं. गन्ने के ऊपरी हिस्से में बहुत सारे अनियमित छेद बन जाते हैं जिनसे लाल रंग का चमकदार मल बाहर निकलता दिखाई देता है.
इस अंदरूनी नुकसान की वजह से गन्ने की ऊपर की पत्तियों तक पानी और पोषक तत्व पहुंचना बंद हो जाते हैं, जिससे गन्ने का ऊपरी हिस्सा पीला पड़कर सूख जाता है और हल्की हवा या झटके से टूटकर नीचे गिर जाता है.
इस कीट की एक बड़ी खास बात यह देखने को मिली है कि गन्ने के तनों पर छेद करने के व्यवहार के कारण हमेशा वह पारंपरिक गोल रिंगों का पैटर्न नहीं मिलता जिसकी पहचान के लिए अक्सर किसान उम्मीद करते हैं. इसलिए किसानों को केवल पारंपरिक निशानों पर निर्भर रहने के बजाय गन्ने के अंदर हो रहे नुकसान के लक्षणों जैसे कि लाल मल का बाहर आना और अंदर से खोखला होना पर ध्यान देना चाहिए.
इसके अलावा, ऐसे क्षतिग्रस्त गन्ने के डंठलों के अंदर 'कोटेसिया फ्लेविपेस' नामक प्राकृतिक परजीवी की मौजूदगी भी देखने को मिलती है. यह कुदरती परजीवी इस प्लास्सी बोरर कीट की संख्या को नियंत्रित करने और जैविक तरीके से खत्म करने में बहुत बड़ी और मददगार भूमिका निभाता है.
भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के अनुसार किसानों को अपनी फसल को बचाने के लिए वक्त रहते सही इंतजाम और हिफाजत के तरीके अपनाने होंगे ताकि नुकसान को रोका जा सके. जुलाई के बीच से लेकर अगस्त के तीसरे हफ्ते तक गन्ने के ऊपरी सिरों को इकट्ठा करके जला देना या नष्ट कर देना चाहिए, क्योंकि इनमें इस आफत वाले कीट के झुंड छिपे होते हैं. यह मैकेनिकल तरीका तभी कामयाब होता है जब गांव के सभी लोग मिलकर काम करें.
इसके अलावा खेतों में पानी जमा न होने दें और नाइट्रोजन वाली खाद का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने से बचें.अगर किसान गन्ने की पेड़ी की फसल रख रहे हैं, तो उसकी खास देखभाल करें और जिन खेतों में पेड़ी नहीं रखनी है, उनकी तुरंत जुताई करवा दें ताकि बचा-खुचा कीट पूरी तरह खत्म हो जाए.
भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान,लखनऊ के कीट विज्ञान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ अरुण बैठा के अनुसार कीटों को भगाने के लिए लाइट ट्रैप का इस्तेमाल करना चाहिए और साथ-साथ ट्राइकोग्रामा कार्ड जैसी जैविक दवाओं का भी इस्तेमाल करें. इस कार्ड में लगभग 20,000 ट्राइकोग्रामा के अंडे होते हैं, जो 24 घंटे के भीतर मित्र तितलियों में बदल जाते हैं और ये तितलियां हानिकारक प्लास्सी बोरर कीट के अंडों को नष्ट कर देती हैं.
एक एकड़ के खेत के लिए इस कार्ड को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें. इन्हें खेत में मेड़ से 5 मीटर और फिर 10-10 मीटर की दूरी पर बांधें.अगर प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ जाए, तो जानकारों और वैज्ञानिकों की सलाह के मुताबिक ही कीटनाशकों का इस्तेमाल करें.तो इस खतरनाक प्लास्सी बोरर से अपनी गन्ने की फसल को महफूज रख सकते हैं और बेहतरीन पैदावार हासिल कर सकते हैं.