
भारत आज वैश्विक स्तर पर कृषि की एक महाशक्ति है और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी धाक जमा चुका है. हम दूध, दाल और मसालों के उत्पादन में दुनिया में पहले स्थान पर हैं, जबकि फल, सब्जी और अनाज के मामले में दूसरे नंबर पर आते हैं. भारत की सबसे बड़ी खूबी यहां की विविध जलवायु है, जो हमें साल भर अलग-अलग तरह की फसलें उगाने की क्षमता देती है. आज हम न केवल अपनी 140 करोड़ की आबादी का पेट भर रहे हैं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए 'फूड बास्केट' बनने की दिशा में भी तेजी से बढ़ रहे हैं. हमारे पास कच्चे माल का इतना बड़ा भंडार है कि भारत आने वाले समय में दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य कारखाना बन सकता है. लेकिन इस चमक के पीछे एक कड़वा सच यह भी है कि उत्पादन में शीर्ष पर होने के बावजूद, हम अपनी फल और सब्जियों का बहुत ही छोटा हिस्सा 'प्रोसेस' या संरक्षित कर पाते हैं.
इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और किसान की जेब पर पड़ता है. अक्सर हम देखते हैं कि बंपर पैदावार के दिनों में कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स की कमी के कारण प्याज, आलू और टमाटर जैसी फसलें सड़कों पर फेंक दी जाती हैं या खेतों में ही सड़ जाती हैं.
जब किसान की मेहनत उगाई फल सब्जियां पहुंचने से पहले ही बर्बाद हो जाती है, तो उसे अपनी लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है. अगर हम इस बर्बादी को आधुनिक तकनीक और फूड प्रोसेसिंग के जरिए रोक लें, तो न केवल फल-सब्जियों के दाम स्थिर रहेंगे, बल्कि किसानों की आय में भी जबरदस्त उछाल आएगा. अपने देश में अनाज और दालों की प्रोसेसिंग तो 90 फीसदी तक होती है, लेकिन फल और सब्जियों में यह आंकड़ा केवल 7 फीसदी है. इसके मुकाबले अमेरिका 65 फीसदी और चीन 23 फीसदी फल-सब्जियों को प्रोसेस करता है.
वैश्विक बाजार में भी भारत की हिस्सेदारी अभी केवल 2.55 फीसदी है. दुनिया भर में प्रोसेस्ड सब्जियों का बाजार लगभग 97 लाख करोड़ रुपये का है और फलों का बाजार 77 लाख करोड़ रुपये का है. इस विशाल बाजार पर वर्तमान में यूरोप का 47 फीसदी तक कब्जा है.
भारत को अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए अब कच्चे माल के बजाय 'वैल्यू ऐडेड' उत्पादों जैसे—रेडी-टू-ईट और फ्रोजन फूड पर ध्यान देना होगा क्योकि भारत का अपना घरेलू बाजार भी बहुत तेजी से बदल रहा है. शहरों के विस्तार और व्यस्त जीवनशैली के कारण अब लोग 'सुविधा' और 'स्वाद' दोनों चाहते हैं. यही कारण है कि पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड की मांग रिकॉर्ड स्तर पर है. अनुमान है कि 2026 तक भारत में खाने-पीने पर होने वाला कुल खर्च 100 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर जाएगा. आज का भारतीय ग्राहक सेहत के प्रति भी जागरूक है, इसलिए वह स्वच्छ और पोषक उत्पादों की तलाश में रहता है. बाजार में अब डेयरी उत्पादों, फ्रोजन स्नैक्स और मोटे अनाज (जैसे बाजरा, रागी) से बनी चीजों की मांग में जबरदस्त तेजी देखी जा रही है.
देश में फल सब्जियों का उत्पादन अधिक होने के बाद भी भारत में हर साल हजारों करोड़ रुपये की फसलें केवल इसलिए खराब हो जाती हैं क्योंकि हमारे पास पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रिजेरेटेड वैन नहीं हैं. इस बर्बादी को रोकने के लिए सरकार अब 'मेगा फूड पार्क्स' और 'कोल्ड चेन प्रोजेक्ट्स' पर जोर दे रही है. इसका उद्देश्य खेत से लेकर बंदरगाह तक एक ऐसी आधुनिक सप्लाई चेन बनाना है, जिससे माल खराब न हो और किसानों को उनकी मेहनत का पूरा दाम मिले. जब हमारी सप्लाई चेन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होगी, तभी भारतीय ब्रांड विदेशों में अपनी धाक जमा पाएंगे.
भारत के पास प्रचुर मात्रा में कच्चा माल और दुनिया की सबसे युवा कार्यशक्ति है. हमारा लक्ष्य 2047 तक भारत को दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य प्रसंस्करण केंद्र बनाना है. यदि हम आधुनिक तकनीक अपनाते हैं और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों का पालन करते हैं, तो हम वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी को आसानी से दोगुना कर सकते हैं. यह बदलाव न केवल देश की जीडीपी में योगदान देगा, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा करेगा और किसानों की आय बढ़ाने में सबसे बड़ा मददगार साबित होगा. भारत के पास कच्चा माल भी है और काम करने वाले हाथ भी. बस जरूरत है आधुनिक तकनीक और बेहतर स्टोरेज की जिस दिन हम अपनी बर्बादी को कमाई में बदल देंगे, उस दिन भारत सही मायने में दुनिया की 'फूड फैक्ट्री' बन जाएगा."