
उत्तर प्रदेश के आलू किसानों के लिए 'स्कैब' यानी चेचक रोग गले की फांस बन गया है, क्योंकि इसकी वजह से आलू की सूरत बिगड़ते ही बाजार में उसकी साख गिर जाती है. कानपुर और प्रयागराज के किसानों का दर्द है कि मेहनत से उगाई फसल केवल बाहरी धब्बों के कारण 1 रुपया किलो जैसे मामूली दाम पर बिक रही है, जिससे लागत निकालना भी दूभर है. किसान फसल की खुदाई के समय 30% तक बर्बादी झेल रहे हैं, क्योंकि दागी आलू को कोई व्यापारी हाथ लगाने को तैयार नहीं होता. बल्कि दागदार आलू के साथ रखे जाने पर अच्छी किस्म की फसल भी संक्रमित होने के डर से बाजार में पिट रही है.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यह रोग 'स्ट्रेप्टोमाइसिस' नामक बैक्टीरिया से फैलता है. आलू के ऊपर भूरे, खुरदरे धब्बे और गड्ढे हो जाते हैं. हालांकि आलू अंदर से ठीक होता है, लेकिन बाहर से देखने में 'बदसूरत' होने के कारण व्यापारी इसे खरीदने को तैयार नहीं होते हैं.
कानपुर के आलू प्रगतिशील किसान भवरपाल सिंह का कहना है कि यह बीमारी हर साल पैर पसार रही है. इस रोग के कारण आलू की ऊपरी सतह पर बदसूरत छेद और खुरदरे धब्बे हो जाते हैं, जिससे आलू दिखने में बहुत खराब लगता है. और इससे आलू की क्वालिटी खराब हो जाती है. व्यापारी बहुत कम दाम में खरीदते हैं. यहां तक कि इस तरह के आलू को 1 रुपया किलो तक बेचना पड़ रहा है.
प्रयागराज के किसान राम राज यादव के अनुसार, इस रोग के कारण, खुदाई के समय 20 से 30 प्रतिशत तक फसल खराब मिल रही है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि आलू अंदर से ठीक होने के बावजूद केवल बाहरी दिखावट खराब होने की वजह से बाजार में अपनी चमक खो देता है. व्यापारी इसे औने-पौने दाम पर खरीदते हैं, जिससे किसानों को लागत निकालना भी भारी पड़ रहा है. कई बार तो अच्छी गुणवत्ता वाला आलू भी इस संक्रमित आलू के साथ रखने से अपनी साख खो देता है.
डॉ.राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा समस्तीपुर के पादप रोग विभाग हेड डॉ एस. के. सिंह के अनुसार, कॉमन स्कैब एक तरह का बैक्टिरिया रोग है, जो स्ट्रेप्टोमाइसिस नामक बैक्टीरिया से फैलता है. यह मुख्य रूप से मिट्टी के जरिए आलू के कंदों पर हमला करता है. इसके लक्षणों को पहचानना बहुत आसान है.
आलू की त्वचा पर गोल, भूरे और उभरे हुए पपड़ीदार धब्बे दिखाई देने लगते हैं. कई बार ये धब्बे इतने गहरे हो जाते हैं कि आलू में गड्ढे या छेद जैसे दिखने लगते हैं. हालांकि, यह बीमारी आलू के पौधे के ऊपरी हिस्से पत्तियों पर दिखाई नहीं देती, लेकिन जमीन के अंदर यह कंद की सूरत बिगाड़ देती है. इससे आलू की भंडारण क्षमता भी कम हो जाती है और वह जल्दी सड़ने लगता है.
कृषि विज्ञान केंद्र, नरकटियागंज के हेड पौध सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ. आर.पी. सिंह अनुसार, आलू में 'चेचक रोग' फैलने के तीन बड़े कारण हैं. पहला, मिट्टी का क्षारीय होना यानी पीएच (pH) लेवल 7 से अधिक होना. दूसरा, बुवाई के शुरुआती 5-6 हफ्तों में जब आलू के कंद बन रहे होते हैं, तब खेत में नमी की कमी होना. तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है खेत में कच्ची या अधपकी गोबर की खाद डालना, जो इस बैक्टीरिया को फैलने के लिए भरपूर खुराक देती है.
इसके अलावा, साल-दर-साल एक ही खेत में लगातार आलू बोने से यह जीवाणु और भी ताकतवर हो जाता है. इसलिए मिट्टी की सेहत और सिंचाई प्रबंधन पर ध्यान देना किसानों के लिए बेहद जरूरी है.
डॉ एस. के. सिंह के अनुसार, इस बीमारी से निपटने के लिए मिट्टी और बीज का उपचार सबसे कारगर है. खेत तैयार करते समय मिट्टी के पीएच को 5.0 से 5.5 के बीच रखने की कोशिश करें. जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा जैसे मित्र फफूंद का इस्तेमाल करें. सिंचाई का सही तालमेल बिठाएं ताकि कंद बनते समय खेत सूखा न रहे.
रासायनिक बचाव के लिए बुवाई से पहले बीजों को 3% बोरिक एसिड के घोल से साफ करना सबसे सस्ता और असरदार तरीका है. यह प्रक्रिया हानिकारक बैक्टीरिया को शुरू में ही खत्म कर देती है, जिससे आलू की सतह साफ और बेदाग बनी रहती है.
डॉ एस. के. सिंह के अनुसार, किसान हमेशा प्रमाणित और स्वस्थ बीजों का ही चुनाव करें. यदि किसी खेत में पिछले साल यह बीमारी थी, तो वहां कम से कम 2-3 साल तक आलू न बोएं और फसल चक्र अपनाएं. खेत में ताजी गोबर की खाद के बजाय हमेशा अच्छी तरह सड़ी हुई कंपोस्ट खाद और संतुलित उर्वरकों का ही प्रयोग करें.
साथ ही, स्कैब रोग-प्रतिरोधी किस्मों को प्राथमिकता देना एक समझदारी भरा फैसला है. अगर किसान इन वैज्ञानिक तरीकों और एकीकृत प्रबंधन को अपनाते हैं, तो वे अपनी फसल की सूरत और चमक दोनों बचा सकते हैं, जिससे उन्हें बाजार में आलू का सही और वाजिब दाम मिल सकेगा.