
बिहार में खरीफ सीजन में धान की खेती के साथ बाढ़ का संकट बना रहता है. हर साल बाढ़ की वजह से किसानों को काफी नुकसान भी पहुंचता है. हालांकि, इन समस्याओं को देखते हुए बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर की ओर से धान की उन्नत किस्म विकसित की गई है, जो बाढ़ के पानी में 10 से 12 दिन तक डूबने के बावजूद भी उत्पादन पर किसी तरह का असर नहीं डाल रही है. बीएयू, सबौर की ओर से विकसित धान की उन्नत वैरायटी ‘सबौर विभूति’ विश्वविद्यालय के अनुसंधान प्रक्षेत्र में लगभग 10–12 दिनों तक जलमग्न रहने के बावजूद सुरक्षित रही है. शुरुआती आकलन के अनुसार, बाढ़ की वजह से केवल 10 प्रतिशत तक ही फसल क्षति होने का आकलन विश्वविद्यालय द्वारा व्यक्त किया गया है.
बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) की ओर से विकसित ‘सबौर विभूति’ धान का की किस्म को मुख्य रूप से झुलसा रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को ध्यान में रखते हुए किया गया है. यह मध्यम अवधि में तैयार होने वाली उन्नत किस्म है, जिसकी औसत उपज क्षमता 55–60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इसकी एक विशेषता इसका दाना और स्वरूप है, जो मंसूरी टाइप धान जैसा है. इससे यह किसानों और उपभोक्ताओं की पसंद के अनुसार एक उपयोगी विकल्प बनता है. वर्तमान में विश्वविद्यालय के सबौर स्थित अनुसंधान प्रक्षेत्र में बीज उत्पादन के उद्देश्य से लगभग तीन एकड़ क्षेत्र में इस किस्म की खेती की गई है.
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार, शुरुआती आकलन के अनुसार, इस किस्म में बाढ़ के कारण लगभग 10 प्रतिशत तक ही क्षति होने की संभावना है. इसके अलावा झुलसा रोग से भी फसल को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है, जबकि धान की अन्य कुछ किस्मों में झुलसा और अन्य रोगों का प्रकोप देखा गया है. कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने सबौर विभूति धान के बेहतर प्रदर्शन को किसानों तक पहुंचाने पर विशेष जोर दिया. उन्होंने वैज्ञानिकों को निर्देश दिया कि विश्वविद्यालय के अनुसंधान प्रक्षेत्र में विशेष फील्ड डे का आयोजन किया जाए, ताकि किसान धान के इस किस्म से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकें.
वैज्ञानिक डॉ. अमरेन्द्र कुमार ने बताया कि धान की अन्य उन्नत किस्मों के विकास के लिए जनन द्रव्य (Germplasm) पर अनुसंधान और विकास कार्य उन्नत चरण में है. विश्वविद्यालय का प्रयास है कि भविष्य में किसानों को ऐसी नई किस्में उपलब्ध कराई जाएं, जिनमें झुलसा और अन्य प्रमुख रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता के साथ-साथ बेहतर उत्पादन की क्षमता भी हो. वहीं, धान अनुसंधान के साथ कुलपति ने बताया कि अखिल भारतीय समन्वित लघु धान्य अनुसंधान परियोजना के तहत विकसित और अध्ययन में श्रीअन्न की 6 संभावित किस्मों में सबौर मडुआ-1, सबौर मडुआ-2, सबौर कंगनी-1, सबौर सॉवा-1, सबौर कुटकी-1 और सबौर कोदो-1 शामिल हैं.