नौकरी छोड़ खेती में आजमाई किस्मत, स्ट्रॉबेरी उगाकर बनी लखपती, रोम में मिला सम्मान

नौकरी छोड़ खेती में आजमाई किस्मत, स्ट्रॉबेरी उगाकर बनी लखपती, रोम में मिला सम्मान

मिजोरम की 35 वर्षीय महिला किसान मैरी जेडटी लालरिथांगी ने स्ट्रॉबेरी की खेती से अपनी किस्मत बदल दी. सरकारी नौकरी नहीं मिलने के बाद उन्होंने 1,000 पौधों से खेती शुरू की और 2025 में 10 लाख रुपये से ज्यादा कमाए. उनकी मेहनत को FAO ने सम्मानित किया है. वह यह उपलब्धि हासिल करने वाली मिजोरम की पहली मिजो महिला बनी हैं.

YouTube से सीखी स्ट्रॉबेरी की खेतीYouTube से सीखी स्ट्रॉबेरी की खेती
क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Oct 16, 2026,
  • Updated Oct 16, 2026, 4:38 PM IST

मिजोरम के एक छोटे से गांव की रहने वाली महिला ने अपनी मेहनत और लगन से खेती में बड़ी सफलता हासिल की है. कभी सरकारी नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाली 35 साल की मैरी जेडटी लालरिथांगी (Mari ZT Lalrithangi) आज स्ट्रॉबेरी की खेती से लाखों रुपये कमा रही हैं. उनकी इस सफलता को अब पूरी दुनिया में पहचान मिली है. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संस्था (FAO) ने उन्हें 100 महिला नायकों की सूची में शामिल किया है. खास बात यह है कि वह यह सम्मान पाने वाली मिजोरम की पहली मिजो महिला हैं. उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर मेहनत और कुछ नया करने का हौसला हो, तो खेती भी अच्छी कमाई का जरिया बन सकती है.

रोम में मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान

मैरी जेडटी लालरिथांगी को 15 अक्टूबर को इटली की राजधानी रोम में सम्मानित किया गया. उन्हें यह सम्मान संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संस्था FAO ने दिया. FAO ने साल 2026 को महिला किसानों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में मनाने के तहत 'FAO 100 Women Heroes in Agrifood Systems and Rural Development' नाम से 100 महिलाओं को चुना है. इन महिलाओं ने खेती, खाद्य उत्पादन और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में अपने काम से खास पहचान बनाई है. लालरिथांगी को 131 देशों से आए 600 से ज्यादा नामों में से चुना गया. इस सूची में भारत की दो महिलाओं को जगह मिली है. मिजोरम जैसे छोटे राज्य के दूर-दराज के गांव से आने वाली लालरिथांगी के लिए यह बड़ी उपलब्धि है. यह सम्मान उन महिलाओं की मेहनत को भी पहचान देता है, जो खेती के जरिए अपने परिवार की आमदनी बढ़ा रही हैं और दूसरे लोगों के लिए नई राह बना रही हैं.

सरकारी नौकरी नहीं मिली तो खेती को बनाया कमाई का जरिया

लालरिथांगी मिजोरम के लॉन्गतलाई जिले के सांगाउ गांव की रहने वाली हैं. यह गांव म्यांमार की सीमा के पास स्थित है. उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) से समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक निजी स्कूल में शिक्षक के रूप में काम किया. इसके साथ ही वह सरकारी नौकरी पाने के लिए कई प्रतियोगी परीक्षाओं में भी शामिल हुईं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने अपनी सोच बदली. उन्होंने समझा कि अच्छी कमाई के लिए केवल सरकारी नौकरी पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है. अगर कोई व्यक्ति मेहनत करे और सही तरीके से काम करे, तो दूसरे क्षेत्रों में भी अच्छा भविष्य बना सकता है. इसी सोच के साथ उन्होंने खेती की ओर कदम बढ़ाया. उनका मकसद खुद आर्थिक रूप से मजबूत बनना और अपनी पढ़ाई का इस्तेमाल किसी काम को आगे बढ़ाने में करना था.

1,000 पौधों से शुरू किया काम, अब 10 हजार से ज्यादा पौधे

लालरिथांगी ने साल 2024 में स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू करने का फैसला किया. उन्हें पड़ोसी सियाहा जिले के कुछ किसानों के बारे में पता चला था, जो स्ट्रॉबेरी उगाकर अच्छी कमाई कर रहे थे. इससे उन्हें भी इस खेती को आजमाने की प्रेरणा मिली. उन्होंने शुरुआत में करीब 1,000 स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाए. उनका खेत सांगाउ गांव से लगभग 5 किलोमीटर दूर है. शुरुआत में यह एक छोटा प्रयोग था, लेकिन अच्छी मेहनत और सही देखभाल से उन्हें सफलता मिलने लगी. इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपनी खेती का दायरा बढ़ाया.

आज उनके पास करीब दो हेक्टेयर जमीन पर 10,000 से ज्यादा स्ट्रॉबेरी के पौधे हैं. एक छोटे से प्रयोग से शुरू हुआ उनका यह काम अब अच्छी कमाई देने वाला व्यवसाय बन गया है. उनकी कहानी बताती है कि खेती में नई फसलों को अपनाकर किसान अपनी आमदनी बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं.

स्ट्रॉबेरी की खेती से पहले साल कमाए 1.5 लाख रुपये

लालरिथांगी ने स्ट्रॉबेरी की खेती से पहले ही साल करीब 1.5 लाख रुपये कमाए. इसके बाद साल 2025 में उनकी कमाई बढ़कर 10 लाख रुपये से ज्यादा हो गई. इतनी अच्छी आमदनी ने उन्हें खेती में और आगे बढ़ने का हौसला दिया. उन्होंने केवल ताजे स्ट्रॉबेरी फल बेचने तक खुद को सीमित नहीं रखा. उन्होंने स्ट्रॉबेरी से वाइन और कैंडी जैसे उत्पाद भी तैयार किए. इन उत्पादों को मुख्य रूप से स्थानीय बाजारों में बेचा गया. इस तरह उन्होंने स्ट्रॉबेरी को दूसरे रूप में बेचकर भी कमाई का रास्ता बनाया.

खेती में इस तरह के प्रयोग को वैल्यू एडिशन यानी फसल से नए उत्पाद तैयार करना कहा जाता है. इससे किसानों को अपनी उपज बेचने के नए मौके मिल सकते हैं. लालरिथांगी की सफलता यह भी दिखाती है कि किसान केवल फसल उगाने के बजाय उससे जुड़े दूसरे कारोबार पर भी ध्यान दे सकते हैं.

इंटरनेट और YouTube से सीखी स्ट्रॉबेरी की खेती

लालरिथांगी के पास खेती की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं थी. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने इंटरनेट पर खेती से जुड़ी जानकारी खोजी और YouTube पर उपलब्ध वीडियो की मदद से स्ट्रॉबेरी उगाने के तरीके सीखे. इसके अलावा उन्होंने दूसरे किसानों से भी खेती की तकनीक और जरूरी जानकारी हासिल की. उन्होंने अपनी मेहनत से धीरे-धीरे खेती की बारीकियां समझीं और सीखी हुई बातों को अपने खेत में आजमाया. उनके लिए यह काम आसान नहीं था, क्योंकि उन्हें खेती के साथ अपने परिवार और तीन बच्चों की जिम्मेदारी भी संभालनी थी.

लालरिथांगी ने बताया कि उन्हें पढ़ने और नई चीजें सीखने के लिए दिन में ज्यादा समय नहीं मिल पाता था. इसलिए वह अक्सर देर रात तक इंटरनेट पर खेती से जुड़े वीडियो और दूसरी जानकारियां पढ़ती थीं. कई बार बच्चों को दूध पिलाते समय भी वह खेती के बारे में सीखती रहती थीं. उनकी यह कहानी दिखाती है कि सीखने की इच्छा और मेहनत के दम पर नई जानकारी हासिल की जा सकती है. हालांकि, हर फसल के लिए सही तकनीक, स्थानीय मौसम और मिट्टी के अनुसार खेती करना जरूरी होता है.

परिवार और कृषि विभाग ने दिया साथ

लालरिथांगी की सफलता में उनके परिवार का भी बड़ा योगदान रहा है. उनके पति सांगाउ के एक सरकारी प्राथमिक स्कूल में शिक्षक हैं. उनके सास-ससुर ने भी खेती के काम में उनका साथ दिया. पति-पत्नी सप्ताहांत में खेत पर जाकर काम करते हैं. उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय भगवान, परिवार और मिजोरम के बागवानी विभाग को दिया. उनके मुताबिक, इन सभी के सहयोग से वह स्ट्रॉबेरी की खेती को आगे बढ़ा पाईं.

किसी भी नए काम को शुरू करने में परिवार का सहयोग और सही जानकारी काफी मददगार साबित हो सकती है. खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए खेती और उससे जुड़े कारोबार को आगे बढ़ाने में यह सहयोग अहम भूमिका निभा सकता है.

पहले भी मिल चुका है सम्मान

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने से पहले भी लालरिथांगी को उनके काम के लिए सम्मानित किया जा चुका है. साल 2026 में मिजोरम के हॉर्टी फेयर में उन्हें लॉन्गतलाई जिले का सर्वश्रेष्ठ किसान चुना गया था. यह सम्मान भी उनकी मेहनत और खेती में किए गए नए प्रयोगों की पहचान है. अब FAO की ओर से मिले सम्मान ने उनकी उपलब्धि को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया है. उनकी सफलता से मिजोरम के दूसरे किसानों और खासकर ग्रामीण महिलाओं को भी खेती में नए प्रयोग करने की प्रेरणा मिल सकती है.

महिला किसानों के लिए बनीं प्रेरणा

मैरी जेडटी लालरिथांगी की कहानी केवल स्ट्रॉबेरी की खेती से लाखों रुपये कमाने की कहानी नहीं है. यह अपनी परिस्थितियों के बीच नया रास्ता खोजने और आत्मनिर्भर बनने की मिसाल भी है. सरकारी नौकरी में सफलता नहीं मिलने के बाद उन्होंने निराश होकर बैठने के बजाय खेती को अपना काम बनाया और अपनी मेहनत से इसे आगे बढ़ाया. आज उनकी पहचान एक ऐसी महिला किसान के रूप में बनी है, जिन्होंने छोटे स्तर पर शुरुआत की, इंटरनेट से खेती सीखी और अपनी फसल से नए उत्पाद तैयार करके आमदनी बढ़ाई. उनका सफर बताता है कि खेती को भी एक सफल व्यवसाय बनाया जा सकता है. जरूरत है सही जानकारी, मेहनत, परिवार के सहयोग और नए तरीके अपनाने की. लालरिथांगी की उपलब्धि यह संदेश देती है कि महिलाओं के लिए खेती सिर्फ परिवार की मदद करने का काम नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनने और अपनी अलग पहचान बनाने का एक मजबूत रास्ता भी हो सकती है. (PTI)

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