मिथिला-सीमांचल से निकलकर सारण पहुंचा मखाना, किसानों के लिए कमाई का जरिया बनी डूबी जमीन

मिथिला-सीमांचल से निकलकर सारण पहुंचा मखाना, किसानों के लिए कमाई का जरिया बनी डूबी जमीन

बिहार के सारण जिले में पहली बार मखाना की खेती शुरू हुई है. जलभराव वाले निचले इलाकों में 25 एकड़ में हो रही खेती से किसानों को नई उम्मीद मिली है. कृषि विभाग का मानना है कि यह फसल जिले में खेती का नया विकल्प बन सकती है और अगस्त के अंत तक इसकी पहली हार्वेस्टिंग शुरू हो जाएगी.

Saran Makhana CultivationSaran Makhana Cultivation
अंक‍ित कुमार स‍िंह
  • Patna,
  • Aug 06, 2026,
  • Updated Aug 06, 2026, 3:43 PM IST

देश का करीब 80 प्रतिशत से अधिक मखाना का उत्पादन बिहार के मिथिलांचल और सीमांचल क्षेत्र में होता रहा है. हालांकि, बदलते समय के साथ अब इसकी खेती का विस्तार राज्य के उन जिलों में भी शुरू हो गया है, जो अभी तक पारंपरिक फसलों के साथ सब्जी की खेती के लिए जाने जाते रहे हैं. इसी कड़ी में उत्तर बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्र का जिला सारण (छपरा) भी शामिल हो गया है, जहां पहली बार मखाना की खेती शुरू की गई है. वहीं, किसान को उम्मीद है कि इस महीने के अंत तक  फसल की हार्वेस्टिंग हो जाएगी.

बता दें कि सारण जिला मुख्य रूप से गंगा, गंडक और घाघरा तीन नदियों से घिरा हुआ है. वहीं, पानी का निकास सही तरीके से नहीं होने की वजह से जिले का एक बड़ा भूभाग जलमग्न रहता है, जिसकी वजह से किसान खरीफ की फसल के तौर पर धान की खेती कम कर पाते हैं. अब वैसे इलाकों में मखाना की खेती एक उम्मीद बनकर आई है. हालांकि, बीते कुछ सालों में जिले के अंदर फूल, मशरूम, सब्जी और ड्रैगन फ्रूट की खेती का भी विस्तार हुआ है. गौरतलब हो कि बिहार में मखाना की खेती का तो विस्तार हो ही रहा है वही उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में भी जहां जल भराव की समस्या है उन इलाकों में भी खेती की शुरुआत हो चुकी है.

जहां कभी रहता था पानी, अब मखाना की फसल

सारण जिले के जलालपुर प्रखंड में कई एकड़ जमीन लो-लैंड एरिया में आती है, जहां कई महीनों तक खेतों में पानी भरा रहता है. जिसके चलते किसान एक से अधिक फसल की खेती नहीं कर पाते हैं. उन इलाके में किसान अजीत कुमार ने कृषि विभाग की मदद से मखाना की खेती शुरू की है. जिला कृषि पदाधिकारी मधुरेंद्र कुमार सिंह कहते हैं कि आत्मा योजना के तहत करीब 25 एकड़ में मखाना की खेती शुरू की गई है.

अभी मखाना की खेती का यह पहला साल है, लेकिन जिले के वैसे किसान, जिनकी भूमि निचले इलाके में आती है, उनकी ओर से मखाना की खेती को लेकर रुचि दिखाई जा रही है. वहीं, किसानों की रुचि को देखते हुए आने वाले दिनों में विभाग की ओर से प्रशिक्षण दिलाने का काम भी किया जाएगा. ताकि मखाना की खेती का बड़े पैमाने पर विस्तार हो सके.

मखाना की खेती के लिए जमीन है सही

जिला कृषि पदाधिकारी कहते हैं कि हाल के समय में मखाना की फसल काफी अच्छी है और इसे देखते हुए यह उम्मीद लगाई जा सकती है कि इस इलाके की मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त है. वहीं, मखाना फसल की देखरेख कर रहे रविंद्र चौहान कहते हैं कि अगस्त के अंत तक मखाना की हार्वेस्टिंग शुरू हो जाएगी. हालांकि, उनका कहना है कि इस बार उत्पादन कम होगा. सामान्यतः प्रति बीघा 6 क्विंटल तक मखाना की गुरिया (बीज) का उत्पादन होता है, लेकिन यहां पहली बार इसकी खेती होने की वजह से कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा, जिसकी वजह से इस बार उत्पादन कम होने की उम्मीद है. लेकिन आने वाले सालों में अच्छा उत्पादन होगा, क्योंकि यहां की मिट्टी मखाना की खेती के लिए काफी उपयुक्त है.

नई फसल की हार्वेस्टिंग शुरू

मिथिलांचल और सीमांचल के इलाके में मखाना की हार्वेस्टिंग शुरू हो चुकी है. वहीं, इसकी खेती करने वाले दरभंगा जिले के किसान रामकुमार साहू कहते हैं कि जुलाई के मध्य से ही मखाना के बीज निकालने का काम शुरू हो गया है. हाल के दिनों में मखाना का बीज 25,000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बिक रहा है. वहीं, सामान्य लावा 900 रुपये से लेकर बेहतरीन क्वालिटी का 1,500 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है. इसमें चार सूता साइज के मखाना का लावा 950 रुपये प्रति किलो तक है, जबकि पांच सूता से अधिक साइज का लावा 1,250 रुपये प्रति किलो बिक रहा है, वहीं, सबसे बेहतरीन क्वालिटी का लावा 1,500 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है.

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