खतरे में कश्मीर की पहचान, इस पेड़ की कमी से बल्ला उद्योग पर मंडराया संकट

खतरे में कश्मीर की पहचान, इस पेड़ की कमी से बल्ला उद्योग पर मंडराया संकट

बैट बनाने में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख कच्ची सामग्री यानी विलो की पैदावार में पिछले कुछ दशकों में तेजी से गिरावट आई है. कश्मीर भारत का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहां क्रिकेट के बल्ले बनाने के लिए उपयुक्त विलो लकड़ी का उत्पादन होता है.

खतरे में कश्मीर की पहचानखतरे में कश्मीर की पहचान
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Jan 17, 2026,
  • Updated Jan 17, 2026, 11:50 AM IST

कश्मीर का प्रसिद्ध क्रिकेट बैट उद्योग आजकल गहरे संकट का सामना कर रहा है.  दरअसल, बैट बनाने में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख कच्ची सामग्री यानी विलो की पैदावार में पिछले कुछ दशकों में तेजी से गिरावट आई है. कश्मीर भारत का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहां क्रिकेट के बल्ले बनाने के लिए उपयुक्त विलो लकड़ी का उत्पादन होता है. यहां लगभग 400 से 450 बल्ला निर्माण इकाइयां स्थित हैं, जो मुख्य रूप से दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में मौजूद हैं. 700 करोड़ का यह उद्योग प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख बल्ले बनाता है और कृषि, मैन्युफैक्चरिंग और व्यापार के माध्यम से हजारों लोगों को रोजगार देता है.

विलो के उत्पादन में भारी गिरावट

उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि विलो के उत्पादन में गिरावट ने निर्माताओं को परेशान कर दिया है, जिससे उन्हें क्वालिटी वाली लकड़ी मिलने में दिक्कत हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप कुछ मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां बंद होने की कगार पर हैं. जीआर8 स्पोर्ट्स के मालिक और कश्मीर क्रिकेट बैट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के प्रवक्ता फौज़ुल कबीर ने कहा कि कश्मीर में विलो के उत्पादन में पिछले कुछ दशकों में लगभग 75 प्रतिशत की गिरावट आई है. ऐसा इसलिए क्योंकि हर साल विलो के सत्तर हजार पेड़ काटे जाते हैं, और किसान अब विलो की खेती नहीं कर रहे हैं, क्योंकि वे अन्य लाभदायक विकल्पों की ओर रुख कर चुके हैं.

किसान नहीं कर रहे विलो की खेती

उत्पादकों के अनुसार, किसान तेजी से चिनार की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं, क्योंकि यह जल्दी परिपक्व हो जाती है और इससे जल्दी आर्थिक लाभ मिलता है. वहीं, विलो के पेड़ को परिपक्व होने में आमतौर पर 20 से 25 वर्ष लगते हैं, जबकि चिनार की फसल लगभग 8 से 12 वर्षों में तैयार हो जाती है, जिससे यह किसानों के लिए अधिक आकर्षक विकल्प बन जाता है.

फौज़ुल कबीर ने कहा कि पॉपुलर बहुत कम समय में लाभ देता है, इसलिए किसान विलो की तुलना में इसे प्राथमिकता देते हैं. इस बदलाव ने बल्ला उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता को बुरी तरह प्रभावित किया है. उन्होंने आगे बताया कि उन्होंने अपनी इकाई के लिए विलो का पेड़ लगाना शुरू कर दिया है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहा बल्लों का इस्तेमाल

वहीं, बल्ले बनाने वालों का कहना है कि स्थानीय विलो की कमी ने लागत बढ़ा दी है, जिससे कुछ इकाइयों को उत्पादन कम करने या कर्मचारियों की छंटनी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इसमें वो छोटे कारखाने शामिल हैं जिनके पास लकड़ी का भंडारण करने या वैकल्पिक लकड़ी आयात करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं है वो सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं. यह गिरावट तब आई है जब कश्मीर के बल्लों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल चुकी है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई खिलाड़ी स्थानीय रूप से बने विलो बल्लों का उपयोग कर रहे हैं.

विलो की खेती के लिए प्रोत्साहित करने की सलाह

उद्योग जगत के जानकारों का कहना है कि कम से कम 37 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों (पुरुष और महिला दोनों) ने कश्मीरी विलो बल्ले का इस्तेमाल किया है, जो अंग्रेजी विलो के विकल्प के रूप में इसकी बढ़ती पहचान को दिखाता है. एक अन्य निर्माता ने कहा कि हालांकि, विलो की खेती को पुनर्जीवित करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप के बिना उद्योग का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है.  

उन्होंने कहा कि सरकार को किसानों को विलो की खेती करने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि यदि विलो वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करने के लिए समयोचित कदम नहीं उठाए गए, तो यह पारंपरिक उद्योग जल्द ही लुप्त हो सकता है. 

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