किसानों से मक्के की डायरेक्ट खरीद क्यों नहींबिहार में इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए शुरू किए गए 14 इथेनॉल प्लांट्स अब खुद संकट से जूझ रहे हैं. सरकार ने दावा किया था कि इन प्लांट्स से रोजगार बढ़ेगा, पलायन रुकेगा और मक्का किसानों की आमदनी में इजाफा होगा. शुरुआती दौर में ऐसा हुआ भी, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं.
इथेनॉल नीति में बदलाव, मक्का की डायरेक्ट खरीद का सिस्टम न होना और बिचौलियों की सक्रियता के चलते न सिर्फ प्लांट्स पर संकट है, बल्कि मक्का किसानों की कमाई भी अधर में लटक गई है.
इथेनॉल प्लांट्स की रफ्तार धीमी पड़ते ही स्थानीय लोगों के रोजगार पर असर दिखने लगा है. कई प्लांट पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं. अगर हालात नहीं सुधरे तो प्लांट्स में काम कर रहे सैकड़ों मजदूरों की नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है. इससे एक बार फिर पलायन बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
इथेनॉल प्लांट्स से मांग घटने का सीधा असर मक्का किसानों पर पड़ा है. जहां कुछ महीने पहले मक्का 2300–2400 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा था, वहीं अब दाम गिरकर 1700 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है.
गायघाट के किसान सतीश कुमार द्विवेदी कहते हैं, “इस साल मक्के का उत्पादन अच्छा है, लेकिन खरीदने वाला कोई नहीं है. पॉलिसी बदली और इथेनॉल प्लांट्स ने खरीद कम कर दी.”
किसानों का आरोप है कि इथेनॉल प्लांट मक्का किसानों से सीधे खरीद नहीं कर रहे हैं. इसकी वजह से बिचौलियों की भूमिका बढ़ गई है. मुजफ्फरपुर के बड़े मक्का किसान उमाशंकर बताते हैं, “किसान से सीधी खरीद होगी तो कंपनियों को 2400 रुपये तक देना होगा, जबकि बिचौलिये 2000 रुपये में मक्का उपलब्ध करा देते हैं. इसलिए कंपनियां उन्हीं से खरीद करती हैं.”
उनका कहना है कि बिचौलिये मक्के की क्वालिटी को लेकर किसानों को भ्रमित करते हैं और सस्ते में माल खरीदकर प्लांट्स को महंगे दाम पर बेचते हैं.
किसानों का बड़ा सवाल यह है कि जब चीनी मिलें गन्ना किसानों से सीधे खरीद करती हैं और भुगतान सीधे खाते में जाता है, तो इथेनॉल प्लांट मक्का किसानों से डायरेक्ट खरीद क्यों नहीं कर सकते?
उमाशंकर का सुझाव है, “इथेनॉल प्लांट नमी और क्वालिटी का मापदंड तय करें. किसान उसी आधार पर मक्का देगा. इससे बिचौलिये खत्म होंगे और किसानों को सही दाम मिलेगा.”
मुजफ्फरपुर के किसान और व्यापारी कृष्ण कुमार चौधरी बताते हैं कि गायघाट और बोचहां जैसे ब्लॉकों से हर साल हजारों ट्रक मक्का निकलता है. “अगर इथेनॉल प्लांट सीधे किसानों से खरीद करें तो उन्हें बेहतर क्वालिटी मिलेगी और किसान भी घाटे से बचेगा.” उनका कहना है कि सही दाम नहीं मिलने से कई किसान मक्का की खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं.
मक्का किसानों की मांग है कि गन्ने की तरह मक्का खरीद के लिए परमिट सिस्टम बने. इथेनॉल प्लांट किसानों से सीधे खरीद करें और खरीद पर रसीद और तय समय में भुगतान हो. किसानों का कहना है कि अगर यह व्यवस्था लागू हुई तो मक्का किसानों को राहत मिलेगी और इथेनॉल प्लांट्स भी लगातार चल सकेंगे.
इथेनॉल का बाजार पूरी तरह नियंत्रित है. यह उत्पाद खुले बाजार में नहीं बिकता और इसकी खरीद सिर्फ तेल कंपनियां ही करती हैं. यही वजह है कि OMC की खरीद नीति में बदलाव का सीधा असर इथेनॉल प्लांट्स पर पड़ रहा है.
जानकारी के मुताबिक, 2022 में तेल कंपनियों ने बिहार की इथेनॉल फैक्ट्रियों से करार किया था कि अगले 10 साल तक जो भी इथेनॉल उत्पादन होगा, उसकी 100% खरीद OMC के जरिये की जाएगी. इसी भरोसे पर बिहार में बड़े पैमाने पर इथेनॉल प्लांट लगाए गए.
1 नवंबर 2025 से केंद्र सरकार ने नियमों में बड़ा बदलाव कर दिया. नई व्यवस्था के तहत बिहार में इथेनॉल की खरीद को 100% से घटाकर 50% कर दिया गया है. यह नियम सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है. महाराष्ट्र की भी कुछ अनाज आधारित इथेनॉल फैक्ट्रियों पर यही व्यवस्था लागू की गई है.
अब तक जिन इथेनॉल प्लांट्स से पूरा उत्पादन खरीदा जा रहा था, उन्हें नवंबर 2025 से केवल आधे उत्पादन की आपूर्ति का ही आदेश मिल रहा है. इसका सीधा असर फैक्ट्रियों की आर्थिक सेहत पर पड़ रहा है.
बिहार में मक्का उत्पादन और इथेनॉल प्लांट एक-दूसरे पर निर्भर हैं. अगर किसानों को सही दाम नहीं मिला तो मक्का की खेती घटेगी और इसका असर इथेनॉल उत्पादन पर पड़ेगा. अब देखना यह है कि सरकार गन्ने की तरह मक्का खरीद का सिस्टम कब लागू करती है.
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