
लंबे समय से चल रहे सूखे और असामान्य रूप से ज्यादा तापमान का असर कश्मीर में सैकड़ों हेक्टेयर में फैले केसर के खेतों पर पड़ने लगा है, खासकर पुलवामा और बडगाम जिले के करेवा पठारों में. घाटी में सितंबर से ही ज्यादातर सूखा मौसम रहा है और अक्टूबर में तापमान असामान्य रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है.
श्रीनगर में मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक डॉ. मुख्तार अहमद ने 'बिजनेसलाइन' को बताया कि श्रीनगर में 4 अक्टूबर को अधिकतम तापमान 31.2°C दर्ज किया गया, जो 1935 के बाद से अक्टूबर में दर्ज किया गया दूसरा सबसे अधिक तापमान है.
अहमद ने कहा, "5 अक्टूबर को श्रीनगर में तापमान 31°C दर्ज किया गया, जो सामान्य से लगभग 5.6°C ज्यादा है."
तेज गर्मी के बीच, केसर किसान अपने खेतों में पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिससे फसल की वृद्धि और फूल आने को लेकर चिंता बढ़ गई है.
अली मोहम्मद, जो छह कनाल से अधिक जमीन पर केसर की खेती करते हैं, ने बताया कि पानी का स्रोत सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने अपने केसर के खेत के बीच में एक कुआं खोदा है.
उन्होंने कहा, "कुएं से पानी निकला. मैं ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगाने की योजना बना रहा हूं."
मोहम्मद ने कहा कि लंबे समय तक गर्मी और नमी की कमी का असर केसर के कॉर्म — जमीन के नीचे का वह हिस्सा जिससे पौधा उगता है — पर पड़ने लगा है.
उन्होंने कहा, "लगातार गर्मी के कारण कॉर्म सूखने लगे हैं."
अक्टूबर केसर के लिए एक अहम समय होता है, क्योंकि इस दौरान फसल पौधों की वृद्धि और फूल आने के चरण में होती है. स्वस्थ विकास और फूल आने के लिए इस अवधि में मिट्टी में पर्याप्त नमी जरूरी है, जबकि लंबे समय तक सूखा रहने से फसल पर बुरा असर पड़ सकता है.
एक अन्य केसर उगाने वाले किसान अब्दुल मजीद ने कहा कि बारिश न होने पर किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है.
उन्होंने कहा, "अगर मौजूदा सूखा मौसम कुछ और दिन बना रहा, तो यह पहले से ही घट रही फसल के लिए बर्बादी का कारण बनेगा."
केसर की खेती कश्मीर में लगभग 20,000-25,000 परिवारों की आजीविका का मुख्य स्रोत है, और यह क्षेत्र आम तौर पर सालाना 13-14 टन केसर का उत्पादन करता है. किसान एक और खराब सीजन को लेकर बहुत चिंतित हैं. उनका कहना है कि बार-बार उत्पादन में उतार-चढ़ाव और खेती की बढ़ती लागत की वजह से उनके पास और नुकसान झेलने के लिए बहुत कम आर्थिक गुंजाइश बची है.
मजीद ने कहा, "पिछले कुछ सालों में खेती की जमीन कम होने और मौसम के उतार-चढ़ाव के कारण पैदावार में भारी गिरावट देखी गई है. एक और खराब सीजन उन किसानों पर और ज्यादा दबाव डालेगा जो पहले से ही खेती की बढ़ती लागत और घटती कमाई से जूझ रहे हैं."