
मॉनसून की शुरुआती सुस्ती और देरी से आई बारिश के चलते इस साल खरीफ फसलों की बुआई का आगाज़ थोड़ा धीमा और पिछड़ा चल रहा था. हालांकि, जुलाई के दूसरे और तीसरे हफ्ते में हुई झमाझम बारिश ने खेतों की प्यास बुझाई है और बुआई की रफ्तार को अचानक तेज कर दिया है. 24 जुलाई 2026 तक जारी कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश भर में खरीफ फसलों का कुल रकबा पिछले साल के 826.19 लाख हेक्टेयर के मुकाबले घटकर 787.37 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है. इसका मतलब है कि खरीफ की कुल बुआई में अभी भी 38.82 लाख हेक्टेयर यानी 4.70% की कुल गिरावट बनी हुई है.
गौर करने वाली बात यह है कि जुलाई के मध्य तक 17 जुलाई तक यह अंतर करीब 6.04% तक का था और मॉनसून की शुरुआत में जून के अंत तक तो यह कमी 16% से अधिक की चिंताजनक स्थिति तक पहुंच गई थी. भले ही जुलाई की बारिश ने धान जैसी मुख्य फसल की रोपाई का रास्ता साफ कर दिया है, जिससे धान का रकबा तेजी से रिकवर हो रहा है, लेकिन दलहनी और तिलहनी फसलों के पिछड़ने का जोखिम अब भी सरकार और मंडियों की पेशानी पर बल डाले हुए है.
धान हमारे देश की सबसे प्रमुख खरीफ फसल है. मॉनसून की शुरुआती देरी का असर इसकी रोपाई पर भी साफ देखने को मिला था, लेकिन जुलाई के झमाझम पानी ने किसानों को राहत दी है. पिछले साल 2025 में 24 जुलाई तक धान की बुआई 240.62 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी, जो इस बार 234.43 लाख हेक्टेयर दर्ज की गई है. धान के रकबे में 6.19 लाख हेक्टेयर यानी 2.57% की कमी आई है.
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे राज्यों में शुरुआती बारिश अनिश्चित रहने के कारण धान की रोपाई थोड़ी प्रभावित हुई थी. हालांकि, बिहार, उत्तर प्रदेश और असम के किसानों ने बारिश का फायदा उठाते हुए धान की रोपाई को तेज कर दिया है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पानी की पर्याप्त उपलब्धता के कारण आने वाले हफ्तों में धान का रकबा पिछले साल के स्तर के बहुत करीब पहुंच सकता है या उसे पार भी कर सकता है.
खाद्य तेलों की आत्मनिर्भरता के लिहाज से तिलहनी फसलें—विशेषकर सोयाबीन और मूंगफली—बेहद अहम मानी जाती हैं. इस खरीफ सीजन में तिलहन फसलों की कुल बुआई 163.54 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले साल के 167.00 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 3.46 लाख हेक्टेयर 2.07% कम है. अगर सोयाबीन की बात करें, तो पिछले साल इसकी खेती 117.24 लाख हेक्टेयर में हुई थी, जो इस साल सिमटकर 113.65 लाख हेक्टेयर रह गई है. यानी सोयाबीन के रकबे में 3.59 लाख हेक्टेयर 3.06% की सीधी कमी दर्ज की गई है.
वहीं दूसरी तरफ, मूंगफली का रकबा पिछले साल के 40.77 लाख हेक्टेयर से घटकर इस साल 40.20 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो 0.57 लाख हेक्टेयर 1.40 की मामूली गिरावट दिखाता है. तिलहनी फसलों में आई इस सुस्ती से आने वाले दिनों में एडिबल ऑयल के बाजार और खाद्य तेलों के आयात पर दबाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
व्यापारिक और नकदी फसलों के मोर्चे पर कपास का प्रदर्शन भी इस बार बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है. देश के कपड़ा उद्योग की जान कहे जाने वाले 'सफेद सोने' यानी कपास का रकबा पिछले साल के 102.71 लाख हेक्टेयर से घटकर इस बार 98.72 लाख हेक्टेयर पर आ गया है. कपास की बुआई में सीधे 3.99 लाख हेक्टेयर की बड़ी कमी आई है, जो प्रतिशत के हिसाब से 3.88% की गिरावट को दर्शाती है. मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में शुरुआती मॉनसूनी बारिश में देरी और किसानों द्वारा अन्य वैकल्पिक फसलों के चुनाव की वजह से कपास का रकबा इस बार थोड़ा सिकुड़ गया है, जिसका असर आने वाले समय में कॉटन की कीमतों पर देखने को मिल सकता है.
धान के सुधरते आंकड़ों के बीच सबसे ज्यादा चिंता दालहन फसलों की बनी हुई है, जिनका बुआई सीजन काफी सीमित होता है. दालों का कुल रकबा पिछले साल के 91.46 लाख हेक्टेयर से गिरकर 84.57 लाख हेक्टेयर 7.54% रह गया है. इसमें सबसे बड़ा झटका अरहर को लगा है, जिसका दायरा 35.27 लाख हेक्टेयर से गिरकर 31.17 लाख हेक्टेयर रह गया है. यानी सीधे 4.10 लाख हेक्टेयर 11.62% की सबसे भारी गिरावट दर्ज की गई है.
हालांकि जुलाई की बारिश ने बुआई के घाटे को काफी हद तक पाट दिया है और अगस्त की शुरुआत तक खेतों में रोपाई-बुआई जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन अरहर और सोयाबीन जैसी फसलों के लिए अब समय का दायरा छोटा होता जा रहा है. अगर मॉनसून का यह रुख आगे भी अनुकूल बना रहता है, तो धान भले ही अपने पुराने रिकॉर्ड को छू ले, पर दलहन और तिलहन फसलों का पिछड़ापन आने वाले दिनों में रसोई के बजट के लिए चुनौती जरूर बना रह सकता है.