
भारत और चीन के बीच व्यापार से जुड़ी एक अहम खबर सामने आई है. चीन ने भारत से भेजी गई नॉन-बासमती चावल की तीन खेपों को यह कहते हुए लौटा दिया कि उनमें जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म (GMO) मौजूद हैं. खास बात यह है कि इन खेपों को भेजने से पहले चीन की ही एक एजेंसी द्वारा जांच कर क्लियर किया गया था, इसके बावजूद वहां पहुंचने के बाद इन्हें खारिज कर दिया गया. इससे भारतीय निर्यातकों और सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है. भारत में अभी तक किसी भी खाद्य फसल की व्यावसायिक स्तर पर GMO खेती की अनुमति नहीं है. केवल कपास ही एक ऐसी फसल है जिसे GMO रूप में उगाने की इजाजत दी गई है. ऐसे में चावल में GMO पाए जाने का दावा कई सवाल खड़े करता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा सिर्फ गुणवत्ता का नहीं, बल्कि व्यापारिक रणनीति से भी जुड़ा हो सकता है.
इस मामले से प्रभावित कंपनियों ने अपनी शिकायत कृषि निर्यात बढ़ावा देने वाली संस्था Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority (APEDA) और Indian Council of Agricultural Research (ICAR) के सामने रखी है. नागपुर की श्रीराम फूड इंडस्ट्री ने ICAR से मांग की है कि वह एक आधिकारिक बयान जारी करे, जिसमें यह साफ किया जाए कि भारत में उगाया जाने वाला चावल पूरी तरह नॉन-GMO है. कंपनी का कहना है कि ऐसे दस्तावेज की कमी के कारण कई खेपों को क्लीयरेंस में दिक्कत हो रही है.
कंपनी के प्रमुख अनुप गोयल के अनुसार, चीन की सरकारी कंपनी CCIC (China Certification & Inspection Group) ने भारत में ही इन खेपों की जांच कर उन्हें मंजूरी दी थी. इसके बावजूद चीन के कस्टम अधिकारियों ने वहां पहुंचने के बाद इन्हें अस्वीकार कर दिया. इस पर निर्यातकों ने APEDA से जांच की मांग की है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ.
विदेश व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह कदम एक सोची-समझी रणनीति हो सकता है. सवाल यह भी उठ रहा है कि चीन सिर्फ भारत से ही GMO-फ्री प्रमाणपत्र क्यों मांग रहा है, जबकि थाईलैंड, वियतनाम, पाकिस्तान और म्यांमार जैसे अन्य देशों से ऐसी मांग नहीं की जा रही. दिलचस्प बात यह है कि चीन खुद भी GMO चावल की खेती करता है.
आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2024-25 में चीन को 1.8 लाख टन से ज्यादा नॉन-बासमती चावल निर्यात किया, जिसकी कीमत करीब 79 मिलियन डॉलर रही. हालांकि यह मात्रा भारत के कुल निर्यात (करीब 14 मिलियन टन) की तुलना में कम है, लेकिन चीन एक बड़ा और बढ़ता हुआ बाजार है. ऐसे में इस तरह की रुकावटें भारतीय निर्यातकों के लिए चिंता का विषय हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द ही इस मुद्दे का समाधान नहीं निकला, तो भारतीय चावल निर्यात पर असर पड़ सकता है. साथ ही किसानों और व्यापारियों दोनों को नुकसान झेलना पड़ सकता है. इसलिए सरकार और संबंधित एजेंसियां इस मामले को गंभीरता से लेते हुए समाधान निकालने की कोशिश में जुटी हैं, ताकि निर्यात में कोई बाधा न आए और किसानों की आय सुरक्षित रह सके.
ये भी पढ़ें:
उत्तर-भारत में दो पश्चिमी विक्षोभ का असर, दक्षिण और पश्चिम में गरमी और उमस बरकरार
इथेनॉल को बढ़ावा: सरकार हर साल 90 लाख टन टूटा चावल देगी, PDS में घटेगी हिस्सेदारी