
पशुपालन में सबसे बड़ी चुनौती सालभर पशुओं के लिए पौष्टिक चारे की व्यवस्था करना है. यदि पशुओं को पर्याप्त मात्रा में हरा और पोषणयुक्त चारा मिले तो उनकी सेहत बेहतर रहती है और दूध उत्पादन भी बढ़ता है. इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने बुंदेल बरसीम-9 (JHB-20-1) नाम की एक उन्नत चारा किस्म विकसित की है. यह किस्म रबी सीजन के लिए खास तौर पर तैयार की गई है और किसानों को अधिक उत्पादन के साथ बेहतर गुणवत्ता वाला चारा उपलब्ध कराने में मदद करती है.
बुंदेल बरसीम-9 को आईसीएआर-भारतीय घास एवं चारा अनुसंधान संस्थान (ICAR-IGFRI), झांसी द्वारा विकसित किया गया है. यह एक उन्नत बरसीम किस्म है, जिसमें अधिक हरा चारा उत्पादन, बेहतर पोषण गुणवत्ता और कई प्रमुख रोगों के प्रति सहनशीलता देखने को मिलती है. यही कारण है कि यह किस्म तेजी से किसानों और पशुपालकों के बीच लोकप्रिय हो रही है.
इस किस्म की खेती मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में करने की सिफारिश की गई है. रबी सीजन के दौरान अक्टूबर से नवंबर का समय इसकी बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है. चूंकि यह सिंचित परिस्थितियों के लिए विकसित की गई है, इसलिए खेत में पर्याप्त नमी और सिंचाई की व्यवस्था होना जरूरी है.
बुंदेल बरसीम-9 की सबसे बड़ी खासियत इसकी उच्च उत्पादन क्षमता है. यह किस्म प्रति हेक्टेयर लगभग 609.1 क्विंटल हरा चारा देने में सक्षम है. इसके अलावा करीब 99.6 क्विंटल सूखी उपज और 14.7 क्विंटल क्रूड प्रोटीन भी प्राप्त होता है. अधिक प्रोटीन होने के कारण यह पशुओं के लिए बेहद पौष्टिक चारा माना जाता है. नियमित रूप से इस चारे का उपयोग करने से पशुओं की शारीरिक वृद्धि और दूध उत्पादन में सकारात्मक सुधार देखा जा सकता है.
फसल में रोग लगने से उत्पादन पर असर पड़ता है और किसानों का खर्च बढ़ जाता है. लेकिन बुंदेल बरसीम-9 में कई प्रमुख रोगों के प्रति अच्छी सहनशीलता पाई गई है. यह रूट रॉट (जड़ सड़न), लीफ स्पॉट (पत्ती धब्बा रोग) और लीफ ब्लाइट जैसे रोगों को काफी हद तक सहन कर सकती है. वहीं स्टेम रॉट और लीफ ब्लाइट के प्रति इसमें मध्यम प्रतिरोधक क्षमता भी मौजूद है. इससे किसानों को रोग नियंत्रण के लिए कम दवाइयों का उपयोग करना पड़ता है.
विशेषज्ञों के अनुसार यह किस्म फॉस्फेट उर्वरकों के प्रति अच्छी प्रतिक्रिया देती है. यदि किसान खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर संतुलित मात्रा में फॉस्फेट का उपयोग करें तो फसल की वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन में भी वृद्धि देखी जा सकती है. इसलिए उर्वरक प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए.
बुंदेल बरसीम-9 को पूरी तरह तैयार होने में लगभग 140 दिन का समय लगता है. यह अवधि रबी सीजन के अनुसार काफी उपयुक्त मानी जाती है. उचित देखभाल और समय पर सिंचाई के साथ किसान इस अवधि में भरपूर मात्रा में गुणवत्तापूर्ण चारा प्राप्त कर सकते हैं.
आज के समय में पशुओं के लिए पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना आसान नहीं है. ऐसे में बुंदेल बरसीम-9 जैसी उन्नत किस्म किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है. अधिक उत्पादन, उच्च प्रोटीन, रोगों के प्रति सहनशीलता और बेहतर पोषण गुणवत्ता के कारण यह किस्म पशुपालकों की आय बढ़ाने में भी मदद कर सकती है. यदि किसान रबी सीजन में इसकी समय पर बुवाई करें और वैज्ञानिक तरीके से खेती करें, तो उन्हें कम लागत में अधिक लाभ मिल सकता है.
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