
पश्चिम बंगाल का नाम सुनते ही लोगों के जेहन में सबसे पहले धान का नाम उभर कर सामने आता है. लोगों को लगता है कि यहां के किसान सिर्फ धान जैसी पारंपरिक फसलों की ही खेती करते हैं. लेकिन ऐसी बात नहीं है. यहां के किसान अब बागवानी में भी दिलचस्पी ले रहे हैं, क्योंकि इसमें लागत के मुकाबले बहुत अधिक मुनाफा होता है. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल के किसान अब पारंपरिक फसलों से दूरी बना रहे हैं और केले की खेती की तरफ आकर्षित हो रहे हैं.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के कूच बिहार जिले के कई किसानों ने केले की खेती शुरू की है. इससे उन किसानों को हाल के सालों में काफ़ी मुनाफ़ा हुआ है. केले की खेती करने वाले कूच बिहार जिले के किसान फ़ज़र अली ने बात करते हुए कहा कि मुझे केले की खेती से अच्छा मुनाफ़ा हुआ है. पहले मैं पारंपरिक खेती से ही अपनी आजीविका चलाता था. लेकिन, करीब पांच साल पहले मैंने केले की खेती शुरू की. तब से मैं पारंपरिक खेती से ज़्यादा कमा रहा हूं. इसमें बहुत कम समय और कम मेहनत लगती है और मुनाफ़ा भी पारंपरिक फसलों से ज़्यादा है.
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उन्होंने कहा कि ऐसे जिले में किसान केले की कई किस्मों की खेती कर रहे हैं, लेकिन जहाजी और मालभोग की बात ही अलग है. इन दोनों ज़्यादा मुनाफे वाली किस्में हैं और इन्हें आसानी से उगाया जा सकता है. उन्होंने आगे कहा कि केले की खेती से किसान प्रति एकड़ 80,000 से 1 लाख रुपये तक कमा सकते हैं. वहीं, चावल, गेहूं और मक्का आदि की पारंपरिक खेती में लागत मूल्य अधिक होता है और बिक्री मूल्य कम होता है, जिसके चलते किसानों को व्यवसाय में भारी नुकसान उठाना पड़ता है. लेकिन केले की खेती में लागत मूल्य कम और बिक्री मूल्य अधिक होता है. इसलिए, जो किसान मुनाफे से जूझ रहे हैं, उन्हें अन्य फसलों के साथ-साथ केले की खेती शुरू करनी चाहिए.
किसान फजर अली ने कहा कि हाल के वर्षों में, जिले में केले की खेती में बहुत अधिक बढ़ोतरी हुई है. कई कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जिले में केले की खेती में और वृद्धि होगी, क्योंकि हाल के वर्षों में किसानों को केले की खेती से काफी मुनाफा हुआ है. उन्होंने कहा कि यदि उर्वरकों और कीटनाशकों का सही तरीके से और सही समय पर उपयोग किया जाए, तो फसल के नुकसान के जोखिम को कम किया जा सकता है.
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