
देश में जलवायु परिवर्तन और पानी की कमी के बीच बाजरा किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण फसल बनकर उभर रहा है. बाजरा ऐसी फसल है जो कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती है. यही कारण है कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बाजरा न केवल किसानों की लागत कम करता है, बल्कि अच्छी आमदनी भी देता है.
बाजरा को सूखा सहन करने वाली फसल माना जाता है. इसकी खेती उन क्षेत्रों में भी आसानी से की जा सकती है जहां बारिश कम होती है. यही वजह है कि इसे भविष्य की फसल भी कहा जाता है. कम संसाधनों में बेहतर उत्पादन देने के कारण यह किसानों की पसंद बनती जा रही है.
बाजरा की खेती गर्म और शुष्क जलवायु में अच्छी होती है. इसके लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है. अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट या हल्की काली मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे बेहतर रहती है. मिट्टी का पीएच मान 6.0 से 8.0 के बीच हो तो फसल का विकास अच्छा होता है.
किसानों को बुवाई से पहले खेत की अच्छी तैयारी करनी चाहिए. इससे बीजों का अंकुरण बेहतर होता है और पौधों की बढ़वार भी तेज होती है.
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बाजरा की कई उन्नत किस्में उपलब्ध हैं, जिनमें ICTP 8203, HHB 67, RHB 177, GHB 558 और Kaveri 55 प्रमुख हैं. इन किस्मों से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है.
बाजरा की बुवाई सामान्य रूप से 15 जून से 15 जुलाई के बीच की जाती है. हालांकि यह समय क्षेत्र और वर्षा की स्थिति के अनुसार थोड़ा बदल सकता है. समय पर बुवाई करने से फसल को पर्याप्त नमी मिलती है और उत्पादन बेहतर होता है.
अच्छी फसल के लिए बीज उपचार बहुत जरूरी माना जाता है. बुवाई से पहले बीजों को फफूंदनाशक दवाओं से उपचारित करने से कई बीमारियों से बचाव होता है. इसके साथ ही खेत में संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए.
बाजरा की फसल को नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की आवश्यकता होती है. संतुलित पोषण मिलने पर पौधे मजबूत बनते हैं और बालियां अच्छी विकसित होती हैं. किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद और उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए.
बाजरा की फसल में डाउनी मिल्ड्यू, ब्लास्ट, अर्गट, लीफ स्पॉट, रस्ट और स्मट जैसी बीमारियां देखने को मिलती हैं. यदि समय पर इनकी पहचान कर नियंत्रण नहीं किया जाए तो उत्पादन पर असर पड़ सकता है.
इसी तरह स्टेम बोरर और शूट फ्लाई जैसे कीट भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. कृषि विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करें और बीमारी या कीट का लक्षण दिखाई देने पर तुरंत उचित दवा का प्रयोग करें. सही मात्रा और सही समय पर छिड़काव करने से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है.
बाजरा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम पानी की जरूरत है. अन्य कई फसलों की तुलना में यह बहुत कम सिंचाई में तैयार हो जाता है. महत्वपूर्ण अवस्थाओं जैसे अंकुरण, फूल आने और दाना बनने के समय नमी का ध्यान रखना जरूरी होता है. यही कारण है कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में भी किसान इसकी सफल खेती कर सकते हैं.
बाजरा केवल किसानों के लिए लाभकारी फसल नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी बहुत उपयोगी माना जाता है. इसमें फाइबर, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, फॉस्फोरस और जिंक जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. यह पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है और शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी लोगों को अपने भोजन में बाजरा शामिल करने की सलाह देते हैं. बढ़ती जागरूकता के कारण बाजार में बाजरा और इससे बने उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है.
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से बाजरा की खेती करें, समय पर बुवाई करें और रोग-कीट प्रबंधन पर ध्यान दें, तो उन्हें अच्छी पैदावार और बेहतर मुनाफा मिल सकता है. कम लागत, कम पानी की जरूरत और बढ़ती बाजार मांग के कारण बाजरा आज किसानों के लिए एक स्मार्ट विकल्प बन चुका है. आने वाले समय में यह फसल किसानों की आय बढ़ाने और पोषण सुरक्षा मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
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