Wheat Production: गेहूं की पैदावार पर अमेरिका और UN में छिड़ी 'जंग', लेकिन दोनों ने माना- भारत में होगा रिकॉर्ड उत्‍पादन

Wheat Production: गेहूं की पैदावार पर अमेरिका और UN में छिड़ी 'जंग', लेकिन दोनों ने माना- भारत में होगा रिकॉर्ड उत्‍पादन

वैश्विक बाजार में गेहूं की पैदावार को लेकर दो बड़े संगठनों, USDA अमेरिका और FAO संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों में बड़ा टकराव दिख रहा है. जहां FAO ने दुनिया भर में उत्पादन में 3% की गिरावट का अंदेशा जताया है, वहीं USDA का दावा है कि पैदावार 5% ज्यादा होगी.

Wheat Production USDA vs FAOWheat Production USDA vs FAO
जेपी स‍िंह
  • नई दिल्ली,
  • Mar 27, 2026,
  • Updated Mar 27, 2026, 1:20 PM IST

दुनिया के  बाजार में इस वक्त गेहूं की कीमतों और पैदावार को लेकर दुनिया के दो सबसे बड़े आर्गेनाइजेशन अमेरिका के कृषि विभाग (यूसडीए) और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के बीच आंकड़ों की एक दिलचस्प 'जंग' छिड़ गई है. साल 2026 की शुरुआत में दुनिया भर में खाने-पीने की चीजों, खासकर गेहूं के संकट को लेकर काफी अंदेशे और डर जताए जा रहे थे. 6 मार्च संयुक्त राष्ट्र की संस्था एफएओ ने अपने शुरुआती अनुमान में कहा था कि इस साल दुनिया भर में गेहूं के उत्पादन में 3 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है, जिससे कुल उत्‍पादन घटकर करीब 810 मिलियन टन रह जाएगी.

इसकी सबसे बड़ी वजह यह बताई गई कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम गिरने से रूस, अमेरिका और यूरोपीय देशों के किसानों ने खेती में दिलचस्पी कम कर दी है. लेकिन, इस मायूसी के बीच यूसडीए की 13 मार्च 2026 की ताजा रिपोर्ट ने बिल्कुल उलट दावा किया है. यूसडीए का कहना है कि दुनिया में गेहूं की कोई किल्लत नहीं होगी, बल्कि पैदावार पिछले साल से 5 फीसदी ज्यादा रहने वाली है. इस विरोधाभास ने व्यापारियों और सरकारों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है कि आखिर आने वाले दिनों में बाजार का असली रुख क्या होगा?

भारत की बंपर पैदावार पर दोनों की मुहर

यूसडीए की इस ताजा रिपोर्ट में सबसे सुखद खबर भारत के लिए है, जहां पैदावार के तमाम पुराने रिकॉर्ड टूटने की उम्मीद है. अमेरिकी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में इस साल गेहूं का उत्पादन पिछले साल के मुकाबले लगभग 50 लाख टन ज्यादा रहने वाला है. यूसडीए ने भारत की पैदावार का अनुमान 1170.95 लाख मीट्रिक टन लगाया है, जबकि भारतीय कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौसम का साथ मिला तो यह आंकड़ा 1200 लाखटन के पार भी जा सकता है.

भारत में लगभग 320.80 लाख हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की बुआई हुई है, जो अपने आप में एक विशाल रकबा है. यह न सिर्फ भारत की खाद्य सुरक्षा  के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि उस वक्त में दुनिया के लिए भी एक बड़ी राहत है जब एफएओ दुनिया में उत्पादन घटने की चेतावनी दे रहा था. दिलचस्प बात यह है कि एफएओ ने भले ही वैश्विक स्तर पर कमी की बात कही हो, लेकिन उसने भी यह माना है कि भारत में इस साल गेहूं की स्थिति पिछले साल की तुलना में काफी बेहतर रहेगी.

जंग, सियासत और गेहूं की कीमतों का उलझा हुआ गणित

बाजार के माहिरों का मानना है कि गेहूं की कीमतों का सीधा ताल्लुक सिर्फ खेतों की हरियाली से नहीं, बल्कि सरहदों पर चल रही 'जंग' और कूटनीति से भी है. इस वक्त इराक, अमेरिका और इजरायल के बीच जो तनाव) और टकराव के हालात बने हुए हैं, उन्होंने पूरी दुनिया की 'सप्लाई चेन' यानी माल की आवाजाही को बेहद पेचीदा और मुश्किल बना दिया है.

अगर यह लड़ाई जल्द खत्म होती है और समुद्री रास्तों से व्यापारिक जहाजों का आना-जाना सुचारू हो जाता है तो गेहूं के दाम काफी हद तक स्थिर रहेंगे और दुनिया भर के आम आदमी को सस्ता आटा नसीब हो सकेगा. लेकिन अगर इराक और इजरायल की यह जंग लंबी खिंची और इसमें नए मोर्चे खुले, तो गेहूं की मांग अचानक बढ़ेगी और कीमतें आसमान छू सकती हैं.

यूसडीए की रिपोर्ट ने एक 'पॉजिटिव' उम्मीद तो जगाई है कि अनाज का भंडार भरपूर है, लेकिन सारा दारोमदार इस बात पर है कि मिडिल ईस्ट के हालात कब तक सामान्य होते हैं. अगर वहां अमन बहाल होता है, तो महंगाई के मोर्चे पर आम जनता को बड़ी राहत मिलनी तय है.

भारतीय निर्यातकों के लिए सुनहरा मौका

मौजूदा वैश्विक हालात भारत के लिए  मौके और कड़ी चुनौतियां दोनों साथ-साथ चल रही हैं. एक तरफ, इजरायल-ईरान युद्ध लंबा खिंचता है और दुनिया के अन्य हिस्सों में सप्लाई की किल्लत होती है तो भारत के पास अपने बम्पर स्टॉक को निर्यात करने का एक ऐतिहासिक मौका होगा. भारत मुख्य रूप से बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात  इंडोनेशिया, ओमान, यमन और फिलीपींस जैसे मुल्कों को गेहूं निर्यात करता है.

राहत की बात यह है कि इनमें से ज्यादातर देश इराक के युद्ध क्षेत्र और प्रभावित समुद्री रास्तों से बाहर हैं, जिससे भारत की सप्लाई चेन सुरक्षित रह सकती है. इससे न केवल भारतीय किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब दाम मिलेगा, बल्कि देश के सरकारी खजाने में भी मोटी विदेशी मुद्राआएगी. भारतीय निर्यातक इसी ताक में बैठे हैं कि कब अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़े और वे भारत को पूरी दुनिया के सामने एक 'अन्नदाता' के रूप में मजबूती से पेश कर सकें.

निर्यात और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन कैसा होगा

बम्पर पैदावार की खबरों के बीच सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि निर्यात और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. हुकूमत को डर रहता है कि कहीं अंधाधुंध निर्यात के चक्कर में घरेलू बाजार में गेहूं के दाम न बढ़ जाएं, जिससे आम आदमी की थाली महंगी हो जाए. इसलिए, सरकार को अपनी 'ट्रेड पॉलिसी' बहुत संभलकर और दूरदर्शिता के साथ बनानी होगी, ताकि किसानों को उनकी फसल का बेहतरीन मुनाफा भी मिले और देश की आम जनता को सस्ता अनाज भी मिलता रहे.

हालांकि अंत में सारा दारोमदार कुदरत के मिजाज पर रहेगा. अगर आने वाले हफ्तों में मौसम ने साथ दिया तो यकीनन यह साल भारत के लिए 'गेहूं की खुशहाली' का साल साबित होगा. यूसडीए की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में उत्पादन 8420 लाख मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान एक बड़ी राहत है. रूस और कनाडा जैसे बड़े उत्पादकों की बेहतर स्थिति और भारत की रिकॉर्ड पैदावार इस बात का साफ इशारा है कि आने वाले दिनों में रोटी की कीमतें काबू में रहेंगी और महंगाई का बोझ कम होगा.

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