
अमूमन खरीफ सीज़न की शुरुआत होते ही सोयाबीन, मक्का, ज्वार जैसी फसलों की बुवाई होने लगती है. लेकिन इस सीजन में सब्जियों की खेती भी किसानों को बड़ा मुनाफा दिला सकती है. खासतौर पर बारिश के मौसम में उगाई जाने वाली बैंगन की फसल किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है. इसके अलावा बैंगन को खरीफ और रबी के साथ-साथ सभी सीजन में उगाया जा सकता है. बैंगन की फसल दो महीने में तैयार हो जाती है. महाराष्ट्र में इस फसल की लगभग 28,113 हेक्टेयर में खेती की जाती है.भारत में सबसे ज्यादा बैंगन उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से ही आता है. इसके अलावा तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में भी बैंगन की खेती होती है.
बैंगन एक लंबे समय की फसल है, इसलिए अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ रेतीली दोमट मिट्टी इसके लिए उचित मनी जाती है और इससे पैदावार भी अच्छी होती है. फसल की वृद्धि के लिए भूमि का पी.एच. मान 5.5-6.6 के बीच होना चाहिए साथ ही सिंचाई का उचित प्रबंधन भी होना चाहिए. बैंगन की फसल सख्त होने के कारण इसे अलग - अलग तरह की मिट्टी में भी उगाया जा सकता है.
बैंगन की उन्नत किस्म प्रमुख रूप से पूसा पर्पल क्लस्टर, पूसा परपल राउंड, पूसा परपल लोंग एवं पूसा हाईब्रिड-6 आदि शामिल हैं. इन किस्मों से किसान अच्छा उत्पादन ले सकते हैं.
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बैंगन की खेती में किसानों को मिट्टी की जांच के अनुसार खाद और उर्वरक डालनी चाहिए.अगर मिट्टी की जांच नहीं हो पाती है तो खेत तैयार करते समय 20-30 टन गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए. इसके बाद 200 किलो ग्राम यूरिया, 370 किलो ग्राम सुपर फॉस्फेट और 100 किलो ग्राम पोटेशियम सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए.
फसल के अच्छे दाम के लिए पूरी तरह से पकने से पहले ही बैंगन की हार्वेस्टिंग कर लेनी चाहिए. ऐसे बैंगन की मांग बाजार में अधिक रहती है. लेकिन तुड़ाई से पहले आपको उसके रंग और आकार का भी खास ध्यान देना चाहिए. यह ध्यान रखें कि जब बैंगन चिकना और आकर्षक हो, तभी इसकी तुड़ाई कर लें.