
हिमाचल प्रदेश में बेमौसम बारिश, बर्फबारी और ओलावृष्टि ने किसानों और बागवानों को गहरी चोट दी है. राज्य के कई इलाकों में सेब, स्टोन फ्रूट और सब्जियों की फसल को भारी नुकसान हुआ है, जबकि खेतों में खड़ी गेहूं की फसल भी बर्बादी की चपेट में आ गई है. अचानक बदले मौसम ने खेती-किसानी की पूरी व्यवस्था को झटका दे दिया है. राज्य के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने साफ कहा कि कई क्षेत्रों में फलों और अन्य फसलों को व्यापक नुकसान हुआ है.
उन्होंने बताया कि मौसम सामान्य होने के बाद ही नुकसान का सटीक आकलन किया जाएगा. उन्होंने यह भी माना कि मौजूदा मुआवजा पर्याप्त नहीं है और इसे बढ़ाने की जरूरत है, जिसके लिए केंद्र सरकार के सामने कई बार मामला उठाया गया है.
मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने राहत राशि में बढ़ोतरी करते हुए मुआवजा 300 रुपये प्रति बीघा से बढ़ाकर 8000 रुपये प्रति बीघा कर दिया है. हालांकि, नुकसान के मुकाबले यह राहत अभी भी कम है. ऐसे में वे केंद्र सरकार से और ठोस मदद की उम्मीद कर रहे हैं.
जगत सिंह नेगी ने किसानों और बागवानों से अपील की है कि वे मौसम आधारित फसल बीमा योजना का लाभ लें और यदि किसी को मुआवजा नहीं मिलता है तो वह लिखित शिकायत दर्ज कराए. उन्होंने बताया कि 2023-24 के कुछ दावों का निपटारा किया जा चुका है, जबकि 2024-25 के दावे प्रक्रिया में हैं.
मंत्री ने कहा कि मार्केट इंटरवेंशन स्कीम के तहत 154 करोड़ रुपये का लंबित भुगतान जारी कर दिया गया है, जिसमें 60 करोड़ रुपये पिछली सरकार के समय के बकाया भी शामिल हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि इस योजना में केंद्र सरकार ने अपनी हिस्सेदारी अब तक नहीं दी है.
शिमला के बागवान सोनम चौहान ने कहा कि पहले सर्दियों में कम बर्फबारी से फसल प्रभावित हुई और अब बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने नुकसान को और बढ़ा दिया है, जो लगभग असहनीय है. वहीं, चोपल क्षेत्र के बागवान श्याम शर्मा ने बताया कि अप्रैल की शुरुआत में तापमान बढ़ने से फूल आ गए थे, लेकिन अचानक तापमान गिरने से फसल को भारी नुकसान हुआ है.
फल, सब्जी और फूल उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान ने कहा कि मौसम आधारित बीमा योजनाओं में प्रीमियम ज्यादा और मुआवजा कम है, जिससे किसानों का भरोसा कमजोर हुआ है.
वहीं, चोपल के एक अन्य बागवान राम लाल ने कहा कि फूल आने के समय तापमान में गिरावट से सेब की फसल को भारी नुकसान होता है और सरकार को तुरंत राहत देनी चाहिए.
बागवानों ने कहा कि पिछले 3-4 वर्षों में जलवायु परिवर्तन का असर साफ दिख रहा है. मौसम की अनिश्चितता बढ़ने से सेब और अन्य फसलों की खेती जोखिम भरी हो गई है. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है. (पीटीआई)