
मेडिसिन, कॉस्मेटिक और लाइव स्टॉक फीड सेक्टर में समुद्री शैवाल (See Weed) का इस्तेमाल बढ़ रहा है. ये तीन ऐसे सेक्टर हैं जहां सीवीड की बड़ी मात्रा में जरूरत है. सीवीड बाजार के हालात ये हैं कि डिमांड ज्यादा और सप्लाई कम है. सरकारी आंकड़े के मुताबिक इसकी एक बड़ी वजह कम लोगों द्वारा इसकी खेती की जा रही है. साथ ही जो लोग खेती कर रहे हैं वो बाजार में अच्छी क्वालिटी के सीवीड की सप्लाई नहीं कर पा रहे हैं. इसी को देखते हुए सरकार सीवीड के बीज और जर्मप्लाज्म को इंपोर्ट करने पर काम कर रही है. केन्द्रीय मत्स्य पालन विभाग के ज्वाइंट सेक्रेटरी की मानें तो इसका उत्पादन इसलिए और भी बढ़ाया जा रहा है, क्योंकि सीवीड का आज बड़े पैमाने पर खाद्य, ऊर्जा, रसायन और पोषण, बायोमेडिकल प्रोडक्ट बनाने में हो रहा है.
मंत्रालय ने सीवीड की खेती को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाते उसके बीज और जर्मप्लाज्म को इंपोर्ट करने के लिए कुछ आसान शर्तों के साथ नीति बनाई हैं. इसका खास मकसद कोस्टल एरिया के गांवों में आर्थिक सुधार के लिए उद्यमों को बढ़ावा देना, स्थिर आजीविका तय करना और मछुआरे समुदाय का सामाजिक-आर्थिक स्तर सुधारना है.
ज्वाइंट सेक्रेटरी सागर मेहरा का कहना है कि सीवीड को लेकर तय किए गए टॉरगेट को हासिल करने के लिए जोर-शोर से काम चल रहा है. इसी कड़ी में करीब 127 करोड़ रुपये से बहुउद्देशीय सीवीड पार्क बन रहा है. वहीं नए प्लान के तहत सीवीड की नई किस्मों के इंपोर्ट होने से रिसर्च और डवलपमेंट को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे लाल, भूरे और हरे शैवाल का उत्पादन बढ़ेगा. ऐसा होने पर प्रोसेसिंग यूनिट को भी कारोबार मिलेगा.
सागर मेहरा का कहना है कि कि पाक खाड़ी के गांव मुनईकाडु में मछुआरे सीवीड की खेती कर रहे हैं. हाल ही में हम लोगों ने मुनईकाडु गांव के किसानों से मुलाकात की थी. इस वक्त देश में करीब 1500 परिवार सीवीड की खेती में लगे हुए हैं. सीवीड का मौजूदा सालाना उत्पादन करीब पांच हजार टन प्रति हेक्टेयर है. हालांकि नीति और तकनीक का इस्तेमाल कर उत्पादन को और कई गुना बढ़ाया जा सकता है.
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