
भारत के पशु विज्ञान क्षेत्र ने एक ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के स्थापना दिवस के खास मौके पर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने देश की पहली स्वदेशी 'अफ्रीकन स्वाइन फीवर' (ASF) वैक्सीन राष्ट्र को समर्पित की. इस खास मौके पर केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह भी मौजूद रहे. भोपाल स्थित 'आईसीएआर-राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान' (ICAR-NIHSAD) के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई यह वैक्सीन पशुओं की सुरक्षा और देश की जैविक सुरक्षा के लिए एक बेहद अहम कदम है. ' हमारे देश के गरीब किसानों और पशुपालकों की किस्मत बदलेगी, बल्कि आने वाले समय में भारत को सस्ती वैक्सीन बनाने और पूरी दुनिया में निर्यात करने वाले एक बड़े केंद्र के रूप में भी खड़ा करेगी.
अफ्रीकन स्वाइन फीवर सूअरों में फैलने वाली एक बहुत ही खतरनाक और जानलेवा बीमारी है. इसका वायरस इतना तेज़ होता है कि इसकी चपेट में आने वाले सूअरों में मौत का खतरा 100 फीसदी तक पहुंच जाता है. साल 2020 में भारत में पहली बार दस्तक देने के बाद, यह बीमारी कई राज्यों में तेज़ी से फैल गई. खासकर हमारे नॉर्थ-ईस्ट के असम और मिजोरम जैसे राज्यों में इसने भारी तबाही मचाई. असम में शुरुआती दौर में ही लगभग ₹276 करोड़ का नुकसान हुआ, जबकि मिजोरम में 11 हज़ार से ज़्यादा परिवारों पर इसका सीधा असर पड़ा और लगभग 982 करोड़ रूपये का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया था,अब तक इस बीमारी का कोई पक्का इलाज या टीका भारत में मौजूद नहीं था, जिसकी वजह से किसानों को मजबूरी में अपने बीमार पशुओं को मारना पड़ता था.
इस गंभीर मुश्किल का तोड़ निकालते हुए भोपाल के वैज्ञानिकों ने 'MA-104 सेल लाइन' पर आधारित लाइव एटेन्युएटेड वैक्सीन तैयार की है. तकनीक के मामले में यह एक बहुत बड़ी और अनोखी कामयाबी मानी जा रही है. अगर दुनिया की बात करें तो फिलहाल केवल वियतनाम के पास इस बीमारी की कमर्शियल वैक्सीन उपलब्ध है, लेकिन वे बहुत महंगी और पेटेंट वाली तकनीक पर बनती हैं. इसके उलट, भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी आसान और हर जगह मिलने वाली कोशिका (MA-104 Cell Line) का इस्तेमाल किया है, जिससे इस वैक्सीन का बड़े पैमाने पर उत्पादन बेहद आसान और सस्ता हो जाएगा. इस स्वदेशी खोज ने महंगे विदेशी टीकों पर भारत की निर्भरता को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है.
यह वैक्सीन सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे ज़मीन पर भी पूरी तरह से परखा गया है. पशुपालन और डेयरी विभाग के सहयोग से इसके फील्ड ट्रायल किए गए हैं, जिसमें यह टीका पूरी तरह सुरक्षित, शुद्ध और असरदार साबित हुआ है. यह वैक्सीन दो महीने से ज्यादा उम्र के तंदुरुस्त सूअरों को दी जा सकती है. इसे लगाने का तरीका बेहद आसान है—सूअर की मांसपेशियों में 1 मिलीलीटर (1 mL) का पहला इंजेक्शन लगाया जाता है और ठीक 14 दिन बाद इसकी एक बूस्टर खुराक दी जाती है. इस टीके से सूअरों के शरीर में बीमारी से लड़ने की ताकत पैदा होती है, जिससे उनकी अकाल मौत का खतरा खत्म हो जाता है.
यह स्वदेशी वैक्सीन सिर्फ एक वैज्ञानिक खोज नहीं है, बल्कि देश के लाखों छोटे किसानों की आजीविका के लिए एक बड़ी राहत है. आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट के मुताबिक, यह खोज पशु चिकित्सा के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत है. इससे सूअरों की मृत्यु दर में भारी कमी आएगी, जिससे पशुपालकों का आर्थिक नुकसान रुकेगा और उनका कारोबार फिर से पनप सकेगा. खाद्य सुरक्षा और पशुधन को मजबूत करने वाली यह तकनीक भारत के कृषि क्षेत्र को नया हौसला देगी. इस स्वदेशी पहल से न केवल देश के भीतर सूअर पालन क्षेत्र को नई जिंदगी मिलेगी, बल्कि दुनिया भर में सस्ती और बेहतरीन वैक्सीन सप्लाई करके भारत एक वैश्विक लीडर के रूप में उभरेगा.