
सजावटी मछली पालन (ऑर्नामेंटल फिश कल्चर) से जुड़े किसानों और उद्यमियों के लिए अच्छी खबर है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत कार्यरत सेंट्रल आइलैंड एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CIARI), अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह ने फैंसी गप्पी मछलियों के पालन के लिए एक नई तकनीक विकसित की है. ‘द्वीप लार्वल रियरिंग टेक्नोलॉजी’ नामक इस तकनीक की मदद से गप्पी मछलियों का विकास पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से किया जा सकता है, जिससे मछली पालकों की आय बढ़ने की संभावना है.
संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार यह तकनीक विशेष रूप से फैंसी गप्पी मछलियों के लिए विकसित की गई है, जो दुनिया भर में एक लोकप्रिय एक्वेरियम मछली मानी जाती हैं. आकर्षक रंगों और सुंदर पंखों वाली इन मछलियों की मांग घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लगातार बनी रहती है.
आईसीएआर-सीआईएआरआई के वैज्ञानिकों ने बताया कि अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में मीठे पानी की सजावटी मछलियों के उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं. यहां के पानी में कम टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स) और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसी जलवायु परिस्थितियां मौजूद हैं, जो ऑर्नामेंटल फिश कल्चर के लिए अनुकूल मानी जाती हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आधुनिक तकनीकों को अपनाया जाए तो द्वीप क्षेत्र सजावटी मछली उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.
आमतौर पर पारंपरिक पालन पद्धति में फैंसी गप्पी मछली के लार्वा को बाजार योग्य आकार हासिल करने में 100 से 120 दिन लग जाते हैं. लेकिन नई द्वीप लार्वल रियरिंग तकनीक अपनाने पर यही मछली 60 से 70 दिनों में बाजार योग्य आकार प्राप्त कर सकती है.
वैज्ञानिकों के अनुसार 0.2 से 0.3 मिलीमीटर आकार के लार्वा को इस तकनीक के माध्यम से मात्र 60-70 दिनों में 2.5 से 3 सेंटीमीटर तक विकसित किया जा सकता है. इससे उत्पादन चक्र कम होगा और एक साल में अधिक बैच तैयार किए जा सकेंगे.
आईसीएआर द्वारा जारी तकनीकी विवरण के अनुसार गप्पी मछलियों की सफल उत्पादन प्रक्रिया को छह चरणों में बांटा गया है।
1. ब्रूड चयन
स्वस्थ, सक्रिय, चमकीले रंग और अच्छे पंखों वाले नर और मादा प्रजनक मछलियों का चयन किया जाता है.
2. प्रजनन और संग्रहण
उपयुक्त स्पॉनिंग परिस्थितियां उपलब्ध कराकर नवजात लार्वा एकत्र किए जाते हैं.
3. प्रारंभिक पालन (0-7 दिन)
लार्वा को साफ पानी वाले टैंकों में रखा जाता है और इन्फ्यूसोरिया जैसे सूक्ष्म जीवों का भोजन दिया जाता है.
4. नर्सरी पालन (8-30 दिन)
लार्वा को बेबी ब्राइन श्रिम्प, मोइना और माइक्रोवर्म जैसे जीवित आहार नियमित रूप से दिए जाते हैं.
5. ग्रो-आउट चरण (31-70 दिन)
उच्च क्वालिटी वाला आहार, बेहतर पानी क्वालिटी और नियमित प्रबंधन सुनिश्चित किया जाता है.
6. बाजार योग्य आकार
60-70 दिनों में मछलियां 2.5 से 3 सेंटीमीटर आकार प्राप्त कर लेती हैं और बिक्री के लिए तैयार हो जाती हैं.
वैज्ञानिकों के अनुसार इस तकनीक से कई लाभ मिल सकते हैं.
संस्थान का दावा है कि कम समय में बाजार योग्य आकार प्राप्त होने से ऑर्नामेंटल फिश कारोबार से जुड़े लोगों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलेगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में एक्वेरियम और सजावटी मछलियों का बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. ऐसे में आईसीएआर की यह नई तकनीक छोटे उद्यमियों, स्टार्टअप्स और मत्स्य पालकों के लिए आय का नया स्रोत बन सकती है. खासकर अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में यह तकनीक रोजगार सृजन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा सकती है.
आईसीएआर-सीआईएआरआई के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक के व्यापक प्रसार से देश में सजावटी मत्स्य पालन उद्योग को नई गति मिल सकती है और किसानों को कम समय में अधिक आमदनी प्राप्त हो सकती है.