प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ रहा El Nino का खतरा, नासा उपग्रहों से मिले ये बड़े संकेत

प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ रहा El Nino का खतरा, नासा उपग्रहों से मिले ये बड़े संकेत

प्रशांत महासागर में एक बार फिर अल नीनो के मजबूत होने के संकेत मिल रहे हैं. नासा और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के उपग्रहों से मिले आंकड़ों में समुद्र के तापमान और जलस्तर में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर यह घटना तेज होती है, तो इसका असर दुनिया भर के मौसम और कृषि पर देखने को मिल सकता है.

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प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ रहा El Nino का खतरा, नासा उपग्रहों से मिले ये बड़े संकेतअल नीनो का खतरा

प्रशांत महासागर में एक बार फिर अल नीनो के मजबूत होने के संकेत मिल रहे हैं. नासा और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के उपग्रहों से मिले आंकड़ों के अनुसार, समुद्र के कुछ हिस्सों में तापमान और जलस्तर सामान्य से अधिक बढ़ रहा है. वैज्ञानिक इस बदलाव पर लगातार नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि अल नीनो का असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ सकता है. इससे बारिश, सूखा, तूफान और तापमान में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने जून 2026 में अल नीनो की स्थिति बनने की पुष्टि की है. वैज्ञानिकों के अनुसार, मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान लगातार कई महीनों तक सामान्य से करीब 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है. यही स्थिति अल नीनो के बनने का प्रमुख संकेत मानी जाती है.

अंतरिक्ष से समुद्र की गर्मी पर नजर

नासा के वैज्ञानिक Sentinel-6 Michael Freilich उपग्रह की मदद से समुद्र में हो रहे बदलावों की निगरानी कर रहे हैं. यह उपग्रह समुद्र की सतह की ऊंचाई में होने वाले बदलावों को मापता है. वैज्ञानिकों के अनुसार, जब समुद्र का पानी गर्म होता है तो वह फैलने लगता है, जिससे समुद्र का स्तर थोड़ा ऊपर उठ जाता है. इससे पता लगाया जा सकता है कि समुद्र के अंदर कितनी गर्मी जमा हो रही है. 8 जून 2026 को मिले आंकड़ों में मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में समुद्र की सतह ऊंची दिखाई दी, जो गर्म पानी की मौजूदगी का संकेत है.

क्या होता है अल नीनो?

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) चक्र का हिस्सा है. इसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इसका असर हजारों किलोमीटर दूर तक देखने को मिल सकता है. अल नीनो के दौरान कई क्षेत्रों में बारिश का पैटर्न बदल जाता है. कुछ जगहों पर ज्यादा बारिश हो सकती है, जबकि कुछ देशों में सूखे की स्थिति बन सकती है. ऑस्ट्रेलिया- इंडोनेशिया और एशिया के देशों में अक्सर सूखे का खतरा बढ़ जाता है, वहीं अमेरिका के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है.

ये संकेत है चिंता का विषय 

वैज्ञानिकों के मुताबिक, 2026 की शुरुआत से ही प्रशांत महासागर में बदलाव के संकेत मिलने लगे थे. समुद्र में बनने वाली केल्विन तरंगों के जरिए गर्म पानी पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ा है. ये तरंगें अक्सर अल नीनो के एक्टिव होने का शुरुआती संकेत मानी जाती हैं. जब प्रशांत महासागर की हवाएं कमजोर पड़ती हैं, तो गर्म पानी पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ने लगता है. इससे पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में गर्म पानी जमा होने लगता है और समुद्र के अंदर की गर्मी बढ़ती जाती है.

1997 के अल नीनो से तुलना

वैज्ञानिक इस संभावित अल नीनो की तुलना वर्ष 1997 की बेहद शक्तिशाली अल नीनो घटना से कर रहे हैं. उस समय दुनिया भर में मौसम पर इसका बड़ा असर देखने को मिला था. हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि 2026 की स्थिति में कुछ अंतर भी हैं और अभी आगे के आंकड़ों का इंतजार किया जा रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि यह अल नीनो कितना मजबूत होगा. फिलहाल उपग्रहों से मिले संकेत बताते हैं कि प्रशांत महासागर में गर्मी का भंडार बढ़ रहा है. अगर अल नीनो मजबूत होता है तो इसका असर कृषि, जल संसाधन और मौसम आधारित गतिविधियों पर भी पड़ सकता है, इसलिए वैज्ञानिक इसकी हर गतिविधि पर करीब से नजर रख रहे हैं. 

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