अगले साल मार्च तक रहेगा अल नीनो का असरअल नीनो की स्थिति अगले साल मार्च तक जारी रह सकती है. एक रिपोर्ट में इस बात की जानकारी दी गई है. यह रिपोर्ट मौसम एजेंसी इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओशन इनफॉर्मेशन सर्विसेज (INCOIS) के पूर्वानुमान के आधार पर जारी की गई है. रिपोर्ट बताती है कि देश में अल नीनो के हालात दक्षिण पश्चिम मॉनसून के बचे दिनों के अलावा 2027 की सर्दियों में भी देखे जाएंगे और यह मार्च तक जारी रह सकता है.
मौसम एजेंसी ने बताया है कि अल नीनो जून में ही एक्टिव हो चुका है जबकि वर्ल्ड मेटरोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन का अनुमान है कि दुनिया में मजबूत अल नीनो की लहर जुलाई-सितंबर की अवधि में महसूस की जाएगी. INCOIS की रिपोर्ट बताती है, ENSO फेज की संभावनाओं से पता चलता है कि अल नीनो का प्रभाव जुलाई 2026 से मार्च 2027 तक देखा जाएगा और इसके चांस 85% से 98% तक हैं.
अल नीनो दक्षिण पश्चिम मॉनसून को कमजोर कर देता है क्योंकि इसके प्रभाव से अरब सागर से नमी वाली हवाएं भारत के मैदानी इलाकों की ओर नहीं चलतीं. इस वजह से बारिश के जिम्मेदार मौसमी सिस्टम नहीं बनते और सूखे जैसी स्थिति पैदा होती है.
अल नीनो का असर केवल भारत पर नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में देखा जा सकता है. यह प्रभाव अलग-अलग सेक्टरों में गंभीर असर छोड़ेगा. इस सूरत में दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत में चीनी, कोको और पाम ऑयल के लिए सूखे का खतरा अधिक है. भारत और थाइलैंड एक्सपोर्ट पर रोक लगा सकते हैं. ऑस्ट्रेलिया में सूखी जमीन पर उगाए जाने वाले गेहूं पर बहुत ज्यादा खतरा है, जिससे मिलिंग की कीमतें बढ़ रही हैं. इसके उलट, अधिक बारिश से ब्राजील और अर्जेंटीना में सोयाबीन और मक्के की पैदावार बढ़ सकती है, जिससे बाद में ग्लोबल स्तर पर सोयाबीन की कीमतें कम हो सकती हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक, मॉनसून के मौसम में प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति और मज़बूत हुई है, और देशभर में बारिश के पैटर्न पर इसका असर देखा गया है. आम तौर पर अल-नीनो भारतीय उपमहाद्वीप में मॉनसून की बारिश को कम कर देता है. 1950 के बाद के रिकॉर्ड बताते हैं कि जब अल-नीनो का असर ज्यादा होता है, तो बारिश सामान्य से कम होती है, और इस साल की स्थिति की तीव्रता 2015-16 जैसी ही लग रही है. उस साल भारत के मॉनसून पर बहुत ज्यादा असर पड़ा था.
इसका गंभीर असर देश के कई प्रमुख राज्यों में देखा जा रहा है. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र को ले सकते हैं. खेती-बाड़ी के लिहाज से यह राज्य बहुत प्रमुख है जहां कम बारिश का सीधा मतलब है किसानों की कमाई में गिरावट. 1 जून से महाराष्ट्र के ज्यादातर जिलों में बारिश मौसमी औसत से कम रही है, हालांकि पिछले हफ्ते कोंकण और मध्य महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में जुलाई की सामान्य बारिश से ज्यादा बारिश दर्ज की गई.
मौसम विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि इस अवधि में होने वाली बारिश की तुलना में कई जिलों में 30-40% और कुछ इलाकों में 50-70% की कमी रही है. जुलाई का महीना ऐसा होता है जब खेती-बाड़ी के काम मिट्टी में पर्याप्त नमी पर निर्भर करते हैं, और बारिश की मौजूदा कमी ने किसानों में चिंता बढ़ा दी है.
जुलाई की शुरुआत में मॉनसून सक्रिय हुआ था और कोंकण और मध्य महाराष्ट्र में बारिश हुई थी, लेकिन वह दौर अब थम गया है. मौसम विभाग के मुताबिक, मॉनसून ट्रफ (मॉनसून की कम दबाव वाली पट्टी) ऐसी स्थिति में चली गई है जो राज्य में व्यापक बारिश के लिए अनुकूल नहीं है. इस समय ऐसे सिस्टम सक्रिय नहीं हैं जो मॉनसून के बहाव को मजबूत कर सकें.
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