लखनऊ जिले के मोहनलालगंज निवासी किसान देविंदर सिंहउत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के मोहनलालगंज क्षेत्र से एक ऐसी किसान की कहानी सामने आई है, जो साबित करती है कि अगर सोच बदल जाए तो किस्मत भी बदल सकती है. लखनऊ के प्रगतिशील किसान देविंदर सिंह आज आधुनिक और वैज्ञानिक खेती का एक सशक्त उदाहरण बन चुके है. परंपरागत खेती से आगे बढ़कर उन्होंने तकनीक, नवाचार और मेहनत के बल पर यह साबित किया है कि यदि खेती को सही दिशा और समझ के साथ किया जाए, तो यह एक लाभकारी और सम्मानजनक व्यवसाय बन सकती है. मोहनलालगंज के रहने वाले सरदार देवेंद्र सिंह एग्रीप्लास्ट (Agriplast) की सहायता से सफल पॉलीहाउस खेती कर रहे हैं.
इंडिया टुडे के किसान तक से बातचीत में देवेंद्र ने बताया कि वर्ष 2015 से रंगीन शिमला मिर्च (लाल- पीली), चुकंदर, ब्रोकली, ग्रीन जुकिनी की खेती कर रहा हूं. 4 एकड़ में पॉलीहाउस के माध्यम से आधुनिक तकनीक अपनाकर उनका सालाना टर्नओवर 1 करोड़ 30 लाख से ज्यादा का है. कुल मिलकर 10 एकड़ में हरी शिमला मिर्च और दूसरी सब्जियों की खेती कर रहे है. देवेंद्र बताते हैं कि केंद्र सरकार की नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड योजना का फायदा उठाया और करीब 70 लाख रुपए की लागत से पॉलीहाउस तैयार कराया. इसमें उन्हें साढ़े 34 लाख रुपए की सब्सिडी भी मिली. तीन एकड़ में पॉलीहाउस बनाकर उन्होंने हरी शिमला मिर्च की खेती शुरू कर दी.
उन्होंने बताया कि ऑनलाइन (जोमैटो- स्विगी) और ऑफलाइन मार्केट में दोनों तरह से शिमला मिर्च की सप्लाई की जाती है. जबकि लोकल लखनऊ की मंडियों में भी सब्जियों की खेप जाती है. वहीं शिमला मिर्च की खेती काफी बेहतर ऑप्शन भी है और इस सब्जी की डिमांड बाजार में साल भर रहती है. सही तरीके से खेती करने पर शिमला मिर्च की फसल आपको अच्छा मुनाफा दे सकती है. शिमला मिर्च की खेती रबी और खरीफ दोनों सीजन में की जा सकती है.
किसान देविंदर सिंह ने खेती को केवल विरासत के रूप में नहीं अपनाया, बल्कि इसे एक प्रोफेशनल एग्री-एंटरप्राइज के रूप में विकसित किया. उन्होंने समय के साथ यह समझा कि बदलते मौसम, बढ़ती लागत और बाज़ार की मांग को देखते हुए परंपरागत तरीकों में बदलाव ज़रूरी है. इसी सोच ने उन्हें पॉलीहाउस, नेट हाउस और ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों की ओर प्रेरित किया.
देविंदर सिंह बताते हैं कि ग्रीन कैप्सिकम, सीडलैस खीरा जैसी उच्च मूल्य वाली सब्ज़ियों की खेती को बड़े पैमाने पर अपनाया. वहीं ड्रिप सिंचाई और नियंत्रित वातावरण (Controlled Farming) के माध्यम से उन्होंने पानी की बचत की. उन्होंने बताया कि इस खास तकनीक से जरिए उत्पादन बढ़ाया और बाज़ार में बेहतर गुणवत्ता की उपज उपलब्ध कराई. उनकी फसलें न सिर्फ़ स्थानीय मंडियों में, बल्कि बड़े ख़रीदारों के बीच भी भरोसे का नाम बन चुकी हैं.
मोहनलालगंज के किसान देवेंद्र सिंह ने आगे बताया कि आधुनिक खेती का रास्ता आसान नहीं था. शुरुआती दौर में तकनीकी जानकारी की कमी, लागत का दबाव और प्राकृतिक जोखिम जैसी चुनौतियां सामने आईं, लेकिन देविंदर सिंह ने कृषि विभाग से मार्गदर्शन, वैज्ञानिक सलाह और अपने अनुभव के ज़रिये इन समस्याओं का समाधान किया. यही धैर्य और सीखने की ललक उन्हें अन्य किसानों से अलग बनाती है. उन्होंने अन्य किसानों के साथ मिलकर समूह के रूप में काम करना शुरू किया, जिससे बीज, खाद और मार्केटिंग में 25-30% की सब्सिडी और लाभ प्राप्त हुआ.
आज देविंदर सिंह केवल एक सफल किसान नहीं, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं. वे अपने अनुभव साझा करते हैं और नई तकनीक अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करते हैं. उनका मानना है कि खेती तभी बचेगी, जब किसान बदलेगा और तकनीक को अपनाएगा.
देविंदर भविष्य में अपनी खेती को और विस्तार देने के साथ-साथ वैल्यू एडिशन, फसल विविधिकरण और युवाओं को खेती से जोड़ने की दिशा में काम करना चाहते हैं. उनकी सोच स्पष्ट है-खेती को सम्मान, स्थिर आय और रोज़गार का सशक्त माध्यम बनाना. उनकी सफल कहानी यह संदेश देती है कि आधुनिक सोच, वैज्ञानिक तकनीक और निरंतर मेहनत से खेती को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है. वे सच मायनों में उत्तर प्रदेश के बदलते कृषि परिदृश्य का एक सशक्त चेहरा हैं. आज देविंदर न सिर्फ खुद अच्छा कमा रहे हैं, बल्कि अपने पॉलीहाउस से लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं.
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