India-US trade dealदेशभर में अमेरिका के साथ 'प्रस्तावित' व्यापार समझौते को लेकर एक ओर जहां सियासी घमासान तेज है. वहीं, किसान संगठन भी इस पर हमलावर हैं. संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने बुधवार को बयान जारी कर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. SKM ने कहा है कि अगर इस समझौते में कृषि या डेयरी क्षेत्र को शामिल किया गया तो देश एक बार फिर 2020-21 जैसे ऐतिहासिक किसान आंदोलन का गवाह बनेगा. एसकेएम ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के उस बयान को झूठा और विरोधाभासी बताया, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में भारत के कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को बाहर रखा गया है.
किसान संगठन ने कहा कि 2 फरवरी को इस समझौते की घोषणा खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर कर दी थी, ऐसे में अब इससे इनकार करना किसानों को गुमराह करने जैसा है. एसकेएम ने प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि करोड़ों किसानों और ग्रामीण मेहनतकशों की आजीविका से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर सरकार का स्पष्ट रुख सामने आना चाहिए.
संगठन ने दो टूक चेतावनी दी कि अगर अमेरिकी दबाव में किसी भी कृषि उत्पाद या डेयरी को इस समझौते में शामिल किया गया तो इसका देशव्यापी विरोध तय है. किसान मोर्चा ने वाणिज्य मंत्री के बयान को अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिन्स के दावों से भी पूरी तरह उलट बताया.
एसकेएम ने कहा कि रोलिन्स ने साफ कहा है कि इस समझौते से भारत के विशाल बाजार में अमेरिकी कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ेगा, जिससे अमेरिका के किसानों को फायदा होगा और भारत के साथ 1.3 अरब डॉलर के कृषि व्यापार घाटे को कम किया जा सकेगा. संगठन ने आरोप लगाया कि इस बयान पर न तो भारत सरकार ने आपत्ति जताई और न ही कोई खंडन किया, जिससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं.
एसकेएम ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा किसानों के हितों की रक्षा के दावे हकीकत से कोसों दूर हैं. संगठन ने 15 अगस्त 2025 के भाषण का हवाला देते हुए कहा कि किसानों के लिए ‘भारी कीमत चुकाने’ की बात कहने के कुछ ही दिनों बाद सरकार ने कपास पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क हटाने की अनुमति दे दी. इसका सीधा असर कपास किसानों पर पड़ा, जो पहले से ही आत्महत्या-प्रवण क्षेत्रों (Suicide Prone Areas) में आते हैं. आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका से कपास आयात एक साल में लगभग दोगुना हो गया, जिससे घरेलू बाजार और कमजोर हुआ है.
किसान मोर्चा ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर भी सरकार को घेरा. संगठन ने कहा कि कपास का MSP लागत के C2+50 प्रतिशत फार्मूले से काफी कम है और सरकार A2+FL के घोषित मूल्य को भी जमीन पर लागू कराने में नाकाम रही है. नतीजतन किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ी.
एसकेएम ने 9 दिसंबर 2021 को सरकार द्वारा दिए गए लिखित आश्वासनों का जिक्र करते हुए कहा कि एमएसपी की कानूनी गारंटी, कर्ज माफी और बिजली क्षेत्र के निजीकरण पर रोक जैसे वादे आज तक पूरे नहीं हुए.
संगठन ने आरोप लगाया कि अमेरिका के साथ यह व्यापार समझौता सरकारी खरीद, एमएसपी और सब्सिडी को कमजोर करेगा और इसका फायदा अमेरिकी कृषि उद्योग को मिलेगा. एसकेएम ने सवाल उठाया कि जब समझौते के ब्योरे अभी अंतिम नहीं थे, तब प्रधानमंत्री को इसकी घोषणा क्यों करनी पड़ी?
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today