
चीनी उद्योग का केंद्र और दशहरी आम के लिए प्रसिद्ध, गेहूं, धान, सरसों जैसी पारंपरिक फसलों के साथ मेंथा और खस जैसी नकदी फसलों की खेती के लिए पहचान रखने वाले जनपद सीतापुर में ‘किसान तक’ का किसान कारवां अपने 31वें पड़ाव के रूप में विकासखंड बिसवां के लालपुर गांव पहुंचा.

प्रथम चरण में कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉ. रीमा ने किसानों को पोषण वाटिका के बारे में जानकारी दी. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि खेतों से जो उत्पाद मिलते हैं, उनसे बनने वाले उत्पादों को यथासंभव घर पर ही तैयार करें, न कि बाजार से खरीदें. इनमें कई प्रकार के उत्पाद शामिल हैं.

दूसरे चरण में चंबल फर्टिलाइजर के प्रतिनिधि दीपक सिंह ने ‘उत्तम प्रणाम’ और ‘उत्तम सुपरराइजा’ उत्पादों के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि ये दोनों जैव-उत्पाद किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हैं. साथ ही इनके उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बनी रहती है. ये उत्पाद रसायन-मुक्त हैं और खेत की सेहत को नुकसान नहीं पहुंचाते.

तीसरे चरण में कृषि विभाग के एडीओ बिसवां, सीतापुर के रविंद्र कुमार ने किसानों को बताया कि प्राकृतिक खेती को लेकर सरकार की ओर से योजनाएं चलाई जा रही हैं. साथ ही क्लस्टर के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए जागरूक किया जा रहा है और खेती भी कराई जा रही है.

चौथे चरण में इफको के डीजीएम एस.सी. मिश्रा ने बताया कि नैनो डीएपी और नैनो यूरिया के उपयोग से फसलों को लगभग 80–90 प्रतिशत तक पोषक तत्वों की उपलब्धता का लाभ मिलता है, जबकि परंपरागत दानेदार उर्वरकों से लाभ अपेक्षाकृत कम मिलता है.

पांचवें चरण में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. शैलेंद्र सिंह ने बताया कि पिछले एक दशक से सीतापुर जिले में खेती में विविधीकरण की दिशा में कार्य किया जा रहा है. खस, औषधीय फसलों, सब्जी और फल उत्पादन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर किसान खेती कर रहे हैं.

छठे चरण में पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. आशाराम ने मुर्गी पालन और बकरी पालन पर जानकारी दी. उन्होंने बताया कि मुर्गी पालन पर सरकार द्वारा 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रहा है. इस योजना का लाभ लेने के लिए प्रशिक्षण लेना आवश्यक है. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि डेयरी क्षेत्र को लेकर भी सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं.

सातवें चरण में मैजिशियन सलमान ने अपनी कला के माध्यम से खेती से जुड़ी जानकारी प्रस्तुत की. साथ ही उन्होंने किसानों को गोबर खाद के उपयोग और पशुपालन को बढ़ावा देने का सुझाव दिया.

आठवें चरण में कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. दया एस. श्रीवास्तव ने कहा कि किसानों को उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक बनने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि यदि किसानों को आत्मनिर्भर बनना है तो बीज के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा, क्योंकि आज अधिकांश किसान बीजों के लिए बाजार पर निर्भर हैं.

नौवें चरण में जिला कृषि रक्षा अधिकारी शिव शंकर कुमार ने कहा कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ना आवश्यक है. खेतों में ढैंचा की फसल अवश्य लगाएं, इससे मिट्टी की ताकत में काफी वृद्धि होती है. उन्होंने कहा कि सरकार और विभाग किसानों के लिए सदैव तत्पर हैं साथ ही बीजों पर 75 प्रतिशत तक सब्सिडी देने का प्रावधान भी किया गया है.

अंतिम और दसवें चरण में लकी ड्रॉ का आयोजन किया गया, जिसमें 10 विजेताओं को 500 रुपये और पांच किसानों को 1000 रुपये का पुरस्कार दिया गया. यह पुरस्कार सुशीला, सोनी, सगीर अहमद, रोहित और रमेश कुमार को दिया गया. इसके साथ ही वृक्षारोपण कार्यक्रम भी आयोजित किया गया, जिसमें कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकारियों द्वारा पौधरोपण किया गया.
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