
पोला पर लगता है अनोखा बाजारआपने अब तक यही सुना होगा कि पैसों से ही बाजार में सामान खरीदा जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले के कोरदा गांव में पोला तिहार पर लगने वाला बाजार इस आम धारणा से बिल्कुल अलग है. यहां खरीददारी के लिए भारतीय रुपये नहीं, बल्कि पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन ही नगदी के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं. लोग पूड़ी, ठेठरी, खुरमी, भजिया, चौसेला और अइरसा देकर कागज और मिट्टी से बने सामान खरीदते हैं. यही अनोखी परंपरा इस मेले को खास बनाती है और इसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं.
भादो माह की अमावस्या को मनाया जाने वाला पोला तिहार इस बार भी कोरदा गांव में उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया. गांव में आयोजित मेले में पारंपरिक तरीके से लेन-देन किया गया. यहां दुकानदारों से सामान खरीदने के लिए लोग नकदी की जगह घर से बनाए गए पारंपरिक पकवान लेकर पहुंचे. पूड़ी सहित अन्य व्यंजनों के बदले कागज और मिट्टी से बने खिलौने और अलग-अलग कलाकृतियां खरीदी गईं. ग्रामीणों के मुताबिक यह परंपरा पिछले कई वर्षों से लगातार चली आ रही है.
मेले में बच्चों द्वारा बनाए गए सुंदर घरौंदे (घर गुइयां) भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे. मिट्टी और कागज से तैयार खिलौनों में मिट्टी की चिड़िया, नंदी बैल, मगरमच्छ, मोर, वन्य जीव और कागज के फूल, गुलदस्ता, झालर जैसी कलाकृतियां सजाई गईं. बच्चों की रचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए घरौंदा प्रतियोगिता भी आयोजित की गई. इसमें बेहतर और आकर्षक घरौंदे बनाने वाले बच्चों को पुरस्कृत किया गया.

पोला तिहार किसानों के लिए भी विशेष महत्व रखता है. इस दिन किसान अपने कृषि औजारों की पूजा करते हैं और मेहनतकश बैलों को सजाकर उनका श्रृंगार किया जाता है. साथ ही उनकी पूजा की जाती है. घर-घर में मिट्टी से बने बैलों और पारंपरिक खिलौनों की भी पूजा की जाती है.
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि कोरदा में पोला के दौरान लगने वाले इस अनोखे बाजार की परंपरा आजादी से पहले से चली आ रही है. समय के साथ आधुनिक बाजार और नकदी का चलन बढ़ा, लेकिन गांव के लोगों ने अपनी इस परंपरा को आज भी जीवित रखा है. मेले में उमड़ती भीड़ इस बात की गवाह है कि नई पीढ़ी भी इस सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है.
कोरदा का यह पोला बाजार महज खरीद-बिक्री का माध्यम नहीं है, बल्कि यहां गांव की परंपरा, किसानों की आस्था और बच्चों की रचनात्मकता एक साथ दिखाई देती है. बिना रुपये के पारंपरिक व्यंजनों से होने वाला यह अनोखा आदान-प्रदान छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की अनूठी तस्वीर पेश करता है. (दीपेन्द्र शुक्ला की रिपोर्ट)
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today