MSP कब बनेगी सभी किसानों का सहारा?देश में हर साल दलहन और तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार प्रयासरत है, क्योंकि देश अभी भी बड़ी मात्रा में इनका आयात करता है. लेकिन जब किसान अपनी लागत लगाकर तिलहन और दलहन का उत्पादन बढ़ाते हैं, तो उनकी उपज का बाज़ार में उचित मूल्य नहीं मिलता और उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम दाम पर बेचना पड़ता है. इस वजह से वे हिम्मत नहीं जुटा पाते कि तिलहन और दलहन उत्पादन क्षेत्र में आगे बढ़ें.
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि केंद्र सरकार फसल विविधीकरण सुनिश्चित करने और दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर तुअर, उड़द और मसूर की पूरी खरीदारी के लिए 100 फीसदी प्रतिबद्ध है. इससे किसानों को थोड़ी आशा जगी है, क्योंकि अगर किसान जो फसल उगा रहा है, उसका उचित दाम नहीं मिलेगा तो उनका मोहभंग होगा. इसलिए जरूरी है कि अगर फसलों की एमएसपी की घोषणा की जा रही है, तो किसानों की उपज एमएसपी से नीचे ना बिके. इसके लिए सरकार ने नेफेड और एनसीसीएफ के माध्यम से इन दालों की खरीद करने के लिए एक सिस्टम बनाने की प्रयास है, जिससे कि इन दाल फसलों की खरीदारी MSP की दर पर सुनिश्चित की जा सके. इसी तरह दूसरी फसलों के लिए भी एक सिस्टम विकसित करना पड़ेगा जिससे कि MSP का लाभ देश के किसानों को ज्यादा से ज्यादा मिल सके.
सरकार को यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि एमएसपी पर आने वाली फसलों का दाम कम से कम एमएसपी से नीचे न बिके. केवल एमएसपी बढ़ाने से किसानों का भला नहीं होगा, बल्कि एमएसपी पर खरीदारी सुनिश्चित करने से ही किसानों को लाभ होगा. एफसीआई के आंकड़ों के अनुसार अगर हम देश की प्रमुख खरीफ की फसल धान की बात करें, तो यूपीए सरकार के दौरान 2013-14 में एमएसपी पर धान की खरीदारी केवल 350 लाख टन होती थी. जबकि एनडीए सरकार के दौरान 2022-23 में 846 लाख टन धान की खरीदारी हुई.
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में 6 गुना ज्यादा एमएसपी पर खऱीदारी हुई क्योकि 2013-14 में 9..07 लाख टन धान की खरीदारी हुई, जबकि 2022-23 64 लाख टन धान की खरीदारी हुई. बिहार, बंगाल में 2013-14 की तुलना में तीन गुना ज्यादा धान की खरीदारी हुई औऱ उड़ीसा में दोगुना ज्यादा एमएसपी पर धान की खरीदारी हुई. देश की दूसरी मुख्य फसल गेहूं की बात करें तो यूपीए सरकार में 2014-15 में एमएसपी पर 250 लाख टन गेहूं की खरीदारी की गई, जबकि 2021-22 में एनडीए सरकार ने एमएसपी पर 433.44 लाख टन गेहूं की खरीदारी की. हालांकि, 2022-23 में गेहूं की एमएसपी पर खरीदारी कम हुई, इसका एक कारण यह है कि गेहूं किसानों को सरकारी मूल्य की तुलना में बाजार में अधिक फायदा दिख रहा था, इसलिए वे एमएसपी पर सरकार को गेहूं नहीं बेच रहे हैं.
धान और गेहूं एमएसपी पर खरीदारी दोगुना और डेढ़ से अधिक हुई थी और जब धान की खरीदारी दोगुनी हुई तो यूपीए सरकार की तुलना में दो से डेढ़ गुना से अधिक किसान लाभान्वित हुए. यह स्पष्ट है कि केवल एमएसपी की बढ़ोतरी ही नहीं, बल्कि खरीदारी के लिए सिस्टम का धीरे-धीरे विकास भी अहम है. नेफेड जैसी सरकारी संस्थाएं, जो घाटे में चल रही थीं और सरकार और जनता पर बोझ बन रही थीं, उन्हें खाद्यान्न की खरीदारी और निर्यात कार्यों में शामिल करके फायदे में ला दिया गया है. इससे इस तरह की संस्थाएं अपना बोझ खुद उठा सकती हैं और जनता और सरकार पर भार नहीं बनतीं है.
इस बात को किसान और किसान नेताओं को भी समझना होगा कि अगर किसानों को फायदा पहुंचाना है तो पहले एमएसपी पर खरीदारी के लिए सिस्टम विकसित करना होगा, क्योंकि पिछली सरकारों ने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया और अगर ध्यान दिया भी तो वह कुछ राज्यों तक सीमित रहा. 1965 में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की स्थापना की गई थी और भारत में सबसे पहले साल 1966-67 में गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा की गई थी. तब देश में हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी और अनाज की तंगी से जूझ रहे देश में कृषि उत्पादन बढ़ाना सबसे प्रमुख लक्ष्य था. लेकिन किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम मिले, इसके लिए सरकार को धीरे-धीरे सिस्टम भी विकसित करना चाहिए था. लेकिन जिस तेजी से काम होना चाहिए था, उस पर ध्यान नहीं दिया गया और केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती थी.
किसानों को बिचौलियों और व्यापारियों के सहारे छोड़ दिया गया, जिसका परिणाम था कि किसानों को उनकी उपज का उचित दाम नहीं मिल पाता था और वे अपने उपज के वाजिब दाम के लिए तरसते रहे. इसलिए वर्तमान सरकार से ज्यादा पुरानी सरकारें दोषी दिखती हैं जिन्होंने इसके लिए सिस्टम विकसित नहीं किया.राजस्थान के किसान नेता रामपाल जाट का कहना है कि जनवरी 1965 में अस्तित्व में आए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना और उपभोक्ताओं को राहत प्रदान करना था, जिसमें केवल दो फसलें गेहूं और धान शामिल थीं. इसमें किसानों को उनकी उपज का दाम कैसे मिले, यह विषय शामिल ही नहीं था.
70 और 80 के दशक में फसलों का एमएसपी निर्धारण होता था, लेकिन वह बाजार भाव से 20 फीसदी कम पर ही सरकारी एजेंसियाँ खरीदती थीं और इसमें किसानों की सहभागिता भी कम थी.वहीं हरियाणा के किसान नेता अभिन्यु कोहाड़ का कहना है कि सरकार को एमएसपी बढ़ाने से ज्यादा जरूरत है कि किसानों की उपज की एमएसपी तय की जा रही दर पर उनकी उपज खरीदने की व्यवस्था की जाए जिससे किसानों को ज्यादा लाभ मिल सके.
बहुत समय से फसलों के सही दाम की मांग की जा रही है. किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलना चाहिए. इसी आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली शुरू की गई थी. पहले केवल गेहूं और धान के लिए यह व्यवस्था की गई थी, लेकिन वर्ष 1986 में इसे 22 जिलों के लिए लागू किया गया. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश आदि को छोड़कर कहीं भी एमएसपी पर फसल खरीदने की व्यवस्था ठीक नहीं है. वह भी केवल धान और गेहूं की फसल पर ज्यादा जोर दिया गया है, भारत में उगाई जाने वाली सैकड़ों फसलों में से सिर्फ 23 फसलों पर ही एमएसपी लागू होता है इससे कई फसलें एमएसपी के दायरे में नहीं आतीं और उन फसलों को उगाने वाले किसान वंचित रह जाते हैं इस कारण किसान साल भर मेहनत करके फसलें तैयार करता है, लेकिन उसे लागत भी नहीं मिल पाती, जबकि बिचौलिए मोटा लाभ कमा रहे हैं. इस व्यवस्था में भी अनेक खामियां हैं, जिन्हें दूर करने की जरूरत है.
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