Wheat Production: रिकॉर्ड तोड़ बुवाई और फरवरी की मेहरबान ठंड, इस साल गेहूं की बंपर पैदावार की उम्मीद

Wheat Production: रिकॉर्ड तोड़ बुवाई और फरवरी की मेहरबान ठंड, इस साल गेहूं की बंपर पैदावार की उम्मीद

इस साल देश में गेहूं की खेती ने नया रिकार्ड बनाया है. बुवाई का रकबा 6.13% बढ़कर 334.17 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो सीधे तौर पर बंपर पैदावार का संकेत है. इस सुनहरी सफलता के पीछे मौसम का बड़ा हाथ बताया जा रहा है, क्योंकि जहां दिसंबर और जनवरी की कड़ाके की ठंड ने पौधों की जड़ों को मजबूती दी और फसल का टिलरिंग' यानी फुटाव को अधिक बनाया, वहीं अब फरवरी का सुहावना मौसम दानों को मजबूत और वजन दार बनाने में मदद कर रहा है. वहीं खास बात यह है कि इस बार किसानों ने क्लाइमेट रेजिलिएंट गेहूं की किस्मों पर भरोसा जताया है. जो अचानक बढ़ते तापमान को झेलने में सक्षम है. मौसम की इस लंबी अनुकूलता और आधुनिक बीजों के तालमेल से उम्मीद है कि इस साल गेहूं उत्पादन के पिछले सभी रिकॉर्ड टूट जाएंगे.

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Wheat Production: रिकॉर्ड तोड़ बुवाई और फरवरी की मेहरबान ठंड, इस साल गेहूं की बंपर पैदावार की उम्मीदगेहूं की बंपर पैदावार

इस साल देश में गेहूं की खेती ने एक नया रिकार्ड बनाया है. सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछले साल 2024-25 में गेहूं का रकबा 328.4 लाख हेक्टेयर था, जो इस साल 6.13 फीसदी की बड़ी बढ़त के साथ 334.17 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है. खेती के इस बढ़ते क्षेत्रफल के साथ-साथ प्रकृति ने भी किसानों का भरपूर साथ दिया है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के विशेषज्ञ डॉ. एस. के. सिंह बताते हैं कि इस साल पड़ी कड़ाके की सर्दी गेहूं की फसल के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. गेहूं को अपनी शुरुआती बढ़त के लिए लंबी और स्थिर ठंड की जरूरत होती है. डॉ. सिंह के अनुसार, दिसंबर और जनवरी की कड़क ठंड ने पौधों की जड़ों को न केवल गहराई तक मजबूत किया है, बल्कि पौधों में 'टिलरिंग' यानी कल्ले फूटने की प्रक्रिया को भी बहुत बेहतर बना दिया है. जब पौधों में कल्ले अच्छे फूटते हैं, तो बालियां भी ज्यादा आती हैं. अगर आने वाले दिनों में तापमान संतुलित रहा और अचानक गर्मी नहीं बढ़ी, तो इस साल प्रति हेक्टेयर उत्पादन में जबरदस्त सुधार होगा और किसानों को बंपर पैदावार मिलेगी.

फरवरी के तापमान से बढेगी उपज और चमक 

गेहूं की पैदावार में मौसम सबसे बड़ा खिलाड़ी होता है. इस साल तापमान का उतार-चढ़ाव फसल के अनुकूल रहा है. दिसंबर 2025 में तापमान में जो गिरावट दर्ज की गई, उसने फसल की जड़ों को मजबूती दी है. वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो अगर इस समय ज्यादा गर्मी होती, तो पौधों की बढ़त रुक सकती थी. लेकिन इस बार संतुलित ठंड की वजह से पौधों का वानस्पतिक विकास बहुत शानदार हुआ है. डॉ. एस.के. सिंह बताते हैं कि फरवरी के दूसरे हफ्ते तक भी तापमान 10 से 15 डिग्री के आसपास रहने का अनुमान है, जो दानों की चमक और उनके वजन को बढ़ाने में काफी मदद करेगा.

नई बीज और नई तकनीक का मिला साथ

आज का किसान केवल किस्मत के भरोसे नहीं है, बल्कि वह तकनीक का हाथ थामे हुए हैं. इस साल किसानों ने जलवायु-सहिष्णु (Climate Resilient) किस्मों का अधिक उपयोग किया है, जो अचानक बढ़ने वाली गर्मी को भी झेल सकती हैं. इसके अलावा, मृदा स्वास्थ्य कार्ड के जरिए संतुलित खाद का उपयोग और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों ने लागत कम की है और पौधों की सेहत सुधारी है. डिजिटल माध्यमों से मिल रही मौसम की सटीक जानकारी ने किसानों को समय पर सिंचाई और कीट प्रबंधन करने में मदद की है, जिससे फसल पर बीमारी का खतरा भी इस साल बहुत कम देखा गया है.

गेहूं उत्पादन के पावरहाउस राज्य

हाल के सालों  में देश के गेहूं उत्पादन में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का दबदबा बरकरार है, जहां सबसे ज्यादा क्षेत्र में बुवाई की गई है. वहीं, पंजाब और हरियाणा अपनी आधुनिक तकनीक और बेहतर बीजों के दम पर प्रति हेक्टेयर सबसे अधिक उपज देने वाले राज्य बने हुए हैं. राजस्थान, बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में भी किसानों ने इस बार नई किस्मों पर भरोसा जताया है. संसाधनों की उपलब्धता और सही समय पर हुई बुवाई ने इन राज्यों में फसल की स्थिति को काफी मजबूत कर दिया है. सरकार की एमएसपी और बीज वितरण जैसी योजनाओं ने भी किसानों का हौसला बढ़ाया है, जिससे वे पारंपरिक खेती से निकलकर वैज्ञानिक तरीके अपना रहे हैं.

गेहूं उपज का होगा रिकार्ड उछाल

अगर आने वाले कुछ हफ्तों तक मौसम इसी तरह मेहरबान रहा, तो भारत गेहूं उत्पादन के पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ सकता है. उत्पादन बढ़ने का सीधा मतलब है किसानों की जेब में ज्यादा पैसा और देश के बफर स्टॉक में मजबूती. इससे न केवल बाजारों में आटे की कीमतें स्थिर रहेंगी, बल्कि भारत दुनिया के सामने एक मजबूत खाद्य निर्यातक के रूप में भी उभर सकता है. कुल मिलाकर, 2025-26 का यह सीजन भारतीय कृषि के लिए एक बड़ी कामयाबी की हो सकती है.

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