50 साल पहले वन भूमि में दर्ज हो गई किसानों की जमीन, अब तक हक के इंतजार में. फोटो- Rajasthan Assemblyवन विभाग की एक गलती सिरोही जिले के 10 किसान पिछले 50 सालों से भुगत रहे हैं. ये किसान अपनी ही जमीन के मालिक नहीं हैं, क्योंकि 50 साल पहले वन विभाग की गलती से इनकी खेती की भूमि वन भूमि में रजिस्टर्ड हो गई थी. ये किसान सिरोही जिले के पिंडवाड़ा तहसील के मुदरला ग्राम पंचायत के रहने वाले हैं. किसान इतने सालों से जमीन पर मालिकाना हक की लड़ाई लड़ रहे हैं.
वहीं, सरकार का कहना है कि वन विभाग मालिकाना हक सौंपने की कोशिश कर रहा है.
अब वन मंत्री हेमाराम चौधरी ने कहा है कि सरकार गंभीरता और संवेदनशीलता से इन 10 किसानों को उनका अधिकार देने की कोशिश कर रही है. मंत्री ने बताया कि भूलवश हुई गलती के कारण इन किसानों का इनकी भूमि पर मालिकाना हक नहीं है.
हेमाराम कहते हैं, “इस संबंध में वन विभाग के अधिकारियों को निर्देशित किया गया है. राजस्व विभाग से भी कहा गया है कि विभाग की ओर से स्वतः संज्ञान लेकर भू-राजस्व अधिनियम की धारा 136 के तहत राजस्व रिकॉर्ड की इस त्रुटि को सुधारा जाना चाहिए.
वन मंत्री हेमाराम चौधरी ने विधानसभा में कहा कि विधानसभा क्षेत्र आबू पिण्डवाड़ा की ग्राम पंचायत मुदरला में करीब 50 साल पहले 10 काश्तकारों की भूमि के भूलवश वनभूमि के तौर पर दर्ज कर लिया गया था. इससे वे किसान वर्षों से अपनी जमीन के मालिकाना हक से वंचित हैं.
मुदरला गांव की 57.6 बीघा भूमि 1960 में वन विभाग के नाम पर दर्ज थी. राज्य सरकार के परिपत्र द्वारा 21 नवम्बर 1960 को बनास कमाण्ड एरिया में आने के कारण इस भूमि को वन विभाग से रिलीज कर काबिज आवंटन के लिए राजस्व विभाग को दिया गया था.
राजस्व विभाग की ओर से एक फरवरी 1965 को जारी विज्ञप्ति के तहत वनखण्ड मुदरला पार्ट एक और पार्ट दो को आरक्षित वन के रूप में घोषित किया गया. लेकिन दर्ज की गई भूमि के बनास कमाण्ड एरिया में होने के कारण राजस्व विभाग की ओर से आवंटन आदेश 27 फरवरी 1966 द्वारा 10 आवंटियों को इस भूमि का आवंटन किया गया. इसके बाद वन विभाग के सेटलमेंट अभियान वर्ष 1972-73 में जमाबन्दी में गलती से इस भूमि को वन विभाग के नाम दर्ज कर दिया गया.
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वन मंत्री हेमाराम चौधरी ने कहा कि विभाग पूरी संवेदनशीलता के साथ इन किसानों को उनका अधिकार दिलवाने का प्रयास करेगा. इस संबंध में विभाग के अधिकारियों को निर्देशित भी कर दिया गया है. लेकिन राजस्थान में फिलहाल विभाग प्रचलित अधिनियम/नियम/ परिपत्र अनुसार राजस्व विभाग की जमाबंदी में वन विभाग के नाम दर्ज वन भूमि को पंचायत क्षेत्राधिकार में देने का कोई प्रावधान ही नहीं है. इसीलिए इन किसानों की लड़ाई अभी और लंबी चलने की संभावना है.
वन भूमि में दर्ज हुई इस भूमि आवंटियों में से एक आवंटी सोमा पुत्र काला की ओर से इस संबंध में उच्च न्यायालय में रिट लगाई गई. हाइकोर्ट ने उसके पक्ष में निर्णय दिया. सोमा की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी लाडू के नाम भूमि दर्ज कर दी गई. विभाग की ओर से उच्च न्यायालय के इस फैसले पर नो-अपील का निर्णय लिया गया.
बाकी किसान इसी आधार पर अपनी जमीन वापस उनके नाम कराने की मांग कर रहे हैं. हालांकि वन मंत्री ने माना है कि विभाग की ओर से एक आवंटी के मामले में दिये गए फैसले के आधार पर सभी आवंटियों की जमीन को उनके नाम करा देना चाहिए था. क्योंकि वन विभाग का इस भूमि पर कोई अधिकार नहीं है.
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वन मंत्री ने विधायक समाराम गरासिया के मूल प्रश्न के लिखित जवाब में बताया कि मुदरला ग्राम पंचायत में वनखंड नहीं होने के बावजूद ग्राम मुदरला, पटवार हल्का अमथला, भू.अभि.नि. किवरली, तहसील आबूरोड के खसरा संख्या 111/10 रकबा 57.06 बीघा भूमि राजस्व विभाग की जमाबंदी में वन विभाग के नाम दर्ज है. उन्होंने जमाबंदी की प्रति सदन के पटल पर रखी.
इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी ने कहा कि पूरे प्रदेश में ऐसे कई मामले हैं. राजस्व विभाग को स्वः प्रेरणा से अभियान चलाकर राजस्व रिकॉर्ड में ऐसी गलतियों को सुधारना चाहिए. ताकि किसी को भी अपने अधिकार से वंचित नहीं रहना पड़े और आमजन को राहत मिले.
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