सस्ते इंपोर्ट से सेब की घरेलू कीमतें आ सकती हैं बहुत नीचेभारत और यूरोपियन यूनियन के बीच हाल ही में हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से कश्मीर के सेब किसानों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. इन किसानों को आशंका है कि अब सस्ते इंपोर्ट से घरेलू कीमतें कम हो सकती हैं और देश के सबसे बड़े सेब उत्पादक क्षेत्र में लोगों की रोजी-रोटी पर असर पड़ सकता है. प्रस्तावित फ्रेमवर्क के तहत, भारत यूरोपीय संघ के देशों से सेब के इंपोर्ट की इजाजत देगा, जिसकी मिनिमम इंपोर्ट प्राइस (MIP) ₹80 प्रति किलोग्राम होगी, साथ ही 20 प्रतिशत इंपोर्ट ड्यूटी भी लगेगी.
बता दें कि शुरुआत में सेब की इंपोर्ट सीमा 50,000 टन तय की गई है, जिसे अगले दशक में धीरे-धीरे बढ़ाकर 1,00,000 टन कर दिया जाएगा. अभी, यूरोपीय संघ के देशों से इंपोर्ट किए जाने वाले सेब पर 50 प्रतिशत इंपोर्ट ड्यूटी लगती है. अंग्रेजी अखबार 'बिजनेसलाइन' की एक रिपोर्ट में कश्मीर में सेब उगाने वालों और व्यापारियों के हवाले से बताया गया कि ड्यूटी कम होने और लैंडिंग कीमतें कम होने से घरेलू उपज के लिए मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा.
शोपियां की मेगा एप्पल मंडी के प्रेसिडेंट और सेब व्यापारी मोहम्मद अशरफ वानी ने कहा कि कश्मीरी सेब की अलग-अलग किस्में ₹125 से ₹135 प्रति किलो के बीच बिकती हैं, और कभी-कभी जब बाजार की स्थिति अच्छी होती है तो कीमतें और भी ज़्यादा हो जाती हैं. उन्होंने आगे कहा कि उम्मीद है कि EU के सेब भारतीय बाजारों में लगभग ₹96 प्रति किलो के भाव पर आएंगे. इस तरह के सस्ते इंपोर्ट से लोकल उपज की कीमतें जरूर कम होंगी.
दरअसल, जम्मू और कश्मीर से भारत के कुल सेब उत्पादन का 75 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा आता है, जिसका सालाना उत्पादन लगभग 20-22 लाख टन है. सेब की इकॉनमी से लगभग ₹12,000 करोड़ का रेवेन्यू मिलता है और यह सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर 7 लाख से ज़्यादा परिवारों को सपोर्ट करती है, जिससे यह इस क्षेत्र में आजीविका का एक जरूरी सेक्टर बन गया है. इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने कहा कि बढ़ते इनपुट कॉस्ट और इंपोर्टेड सेब से बढ़ते कॉम्पिटिशन के कारण घरेलू किसान पहले से ही दबाव में हैं.
जम्मू-कश्मीर फ्रूट एंड वेजिटेबल्स प्रोसेसिंग एंड इंटीग्रेटेड कोल्ड चेन एसोसिएशन (JKPICCA) के एक अमीर सेब उत्पादक और प्रवक्ता इज़हान जावेद ने कहा कि यूरोपीय देशों में खेती बहुत ज़्यादा मशीनीकृत है, जिसमें लेबर कॉस्ट कम होती है और प्रोडक्टिविटी ज़्यादा होती है. उन्होंने कहा कि वे सेब को एक कमर्शियल काम के तौर पर उगाते हैं, जबकि भारतीय किसान उन्हें मुख्य रूप से अपनी रोज़ी-रोटी के लिए उगाते हैं. यहां कई किसानों को अपनी लागत निकालना भी मुश्किल होता है.
अफगानिस्तान, ईरान और तुर्की जैसे देशों से सेब के इंपोर्ट ने पहले ही घरेलू मार्केट शेयर को कम कर दिया है. 2024 में, भारत ने लगभग 5 लाख टन सेब इंपोर्ट किए, जिसमें ईरान ने 1.33 लाख टन, तुर्की ने 1.16 लाख टन और अफगानिस्तान ने 42,716 टन एक्सपोर्ट किया. किसानों को डर है कि FTA के तहत और ज़्यादा छूट मिलने से यह ट्रेंड और तेज़ हो सकता है. दूसरे देशों के साथ हाल के ट्रेड फैसलों पर भी चिंता जताई गई है. भारत-न्यूजीलैंड FTA के तहत, भारत ने सेब पर इंपोर्ट ड्यूटी 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत करने पर सहमति जताई है. दक्षिण कश्मीर के एक और सेब उत्पादक ने कहा कि भारत तेजी से अपना सेब बाजार विदेशी उत्पादकों को खो रहा है. हमने हमेशा घरेलू किसानों की सुरक्षा के लिए ज़्यादा इंपोर्ट ड्यूटी की मांग की है.
बागवानों और ट्रेड बॉडीज़ ने केंद्र से अपनी इंपोर्ट पॉलिसी की समीक्षा करने की अपील की है, और चेतावनी दी है कि बिना रोक-टोक के इंपोर्ट से सेब किसानों और जम्मू-कश्मीर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है. सरकार ने पहले कहा था कि इंपोर्ट ड्यूटी और मात्रात्मक प्रतिबंध के साथ न्यूनतम कीमत घरेलू उत्पादकों की रक्षा करने में मदद करेगी. उसने यह भी कहा था कि EU से 50,000 टन के मौजूदा स्तर से किसी भी बढ़ोतरी की भरपाई दूसरे देशों से कम इंपोर्ट करके की जा सकती है.
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