फसल विविधीकरणआर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में खेती और इससे जुड़े क्षेत्रों को लेकर अहम सुझावों और बदलावों के सुझाव सामने आए हैं. इसी कड़ी में सर्वे में भारत में फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को लेकर भी एक अहम दिशा सुझाई है. सर्वे में कहा गया है कि सरकार को MSP में बदलाव या सरकारी खरीद कमजोर करने के बजाय किसानों को स्वेच्छा से फसल विविधीकरण के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. सर्वे में बताया गया है कि भारत आज भी खाद्य तेल, दालों और कुछ कच्चे कृषि उत्पादों के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में खेती को उपभोग की बदलती जरूरतों, पर्यावरण संतुलन और आत्मनिर्भरता से जोड़ने का यह सही समय है, बशर्ते खाद्य सुरक्षा की मौजूदा व्यवस्था बनी रहे.
आर्थिक सर्वे के मुताबिक, सरकारी गोदामों में अतिरिक्त भंडारण और रखरखाव से होने वाले खर्च को कम कर जो बचत होगी, उसी पैसे से किसानों को धान और गेहूं के विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहन दिया जा सकता है. खासतौर पर उन इलाकों में जहां खरीद ज्यादा होती है, लेकिन किसानों की आय अपेक्षाकृत कम रहती है और वहां दूसरी फसलों की बेहतर संभावना मौजूद है.
सर्वे में सुझाव दिया गया है कि इसकी शुरुआत पूर्वी और मध्य भारत से की जा सकती है. इन क्षेत्रों में बारिश, मिट्टी और बाजार की स्थिति दालों, तिलहनों और मक्का के लिए अनुकूल मानी गई है. बाद में इस मॉडल को उन राज्यों में भी लागू किया जा सकता है, जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए ज्यादा अहम हैं.
सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि फसल चयन पूरी तरह जलवायु और बाजार की मांग के आधार पर होना चाहिए. पूर्वी भारत में मक्का, दालें और तिलहन मौजूदा फसल चक्र में आसानी से फिट होते हैं. वहीं, मध्य भारत में चना और सोयाबीन जैसी तिलहनी फसलें उपयुक्त मानी गई हैं. ये फसलें न सिर्फ खाद्य तेल और दालों के आयात को घटाने में मदद करेंगी, बल्कि इथेनॉल, पशुपालन और बायो-एनर्जी जैसे सेक्टर को भी मजबूती देंगी.
आर्थिक सर्वे रिपोर्ट में किसानों की आय सुरक्षित रखने के लिए प्रति एकड़ या प्रति क्विंटल प्रोत्साहन देने का सुझाव भी दिया गया है. कई राज्यों के अनुभव बताते हैं कि थोड़ा-सा बोनस भी वैकल्पिक फसलों को आर्थिक रूप से आकर्षक बना देता है, खासकर तब जब सिंचाई, खाद और बिजली जैसे इनपुट खर्च भी कम हों.
इस पूरी योजना को केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर लागू करेंगी. केंद्र सरकार खरीद, भंडारण और ब्याज लागत में बचत से अपना योगदान देगी, जबकि राज्य सरकारें इनपुट सब्सिडी में कटौती और मौजूदा योजनाओं से संसाधन जुटाएंगी. शुरुआती दौर में फसल क्षेत्र में बदलाव की पुष्टि के बाद अस्थायी वित्तीय सहायता भी दी जा सकती है.
लंबे समय में सरकार की भूमिका सीधे खरीद से हटकर बाजार को मजबूत करने की होगी. इसके तहत भावांतर भुगतान, बोनस और सुनिश्चित खरीद जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं. साथ ही, तेल प्रसंस्करण, दाल मिलिंग, मक्का ड्राइंग और इथेनॉल से जुड़ा बुनियादी ढांचा विकसित करने पर जोर दिया जाएगा, जिसमें पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की भूमिका अहम होगी.
सर्वे में यह भी साफ किया है गया कि खाद्य सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. जरूरत पड़ने पर खरीद और बफर स्टॉक के नियमों में स्वतः बदलाव किए जाएंगे. साथ ही, WTO के नियमों के अनुरूप टिकाऊ खेती से जुड़े क्षेत्र आधारित प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं. (पीटीआई)
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today